जीवन में सहनशीलता और धैर्य

Patience and tolerance.

दोस्तों आज मै अपने इस आर्टिकल में जीवन में सहनशीलता और धैर्य के विषय में बता रही हूँ जो की आज के युग में जिन माननीय गुणों की प्रायः हममें कमी होती जा रही है उनमें से एक है सहनशीलता और दूसरा है धैर्य   बहुत कम लोग वाकई सहनशील  होते है। कुछ तो अपने भड़कने और उत्तेजित हो उठने के स्वभाव से विवश होने के कारण नाम मात्र भी सहनशील नहीं होते। ऐसे लोग बड़े शेखीबाज और घमण्डी होते है। ये सब अवगुण हीन भावना (इन्फीरियरिटी काम्प्लेक्स) के कारण से ही होते है।

सहनशीलता 

कुछ लोग वास्तव में तो सहनशील नहीं होते पर एटिकेट, मैनर्स याने शिष्टाचार के नाम पर सहनशील होने का अभिनय किया करते है। उनकी मुस्कराहट नकली और नम्रता बनावटी होती है। वे यांत्रिक ढंग से शराफत का ऊपरी दिखावा करते है। जो पति पत्नी घर में तूतू मै मै किया करते है वे बाहर मुस्कराते हुए और बन ठन कर निकलते है ताकि दुसरो को प्रसन्न और खुशहाल दिखाई दें।

लेकिन इससे तब तक कुछ हासिल नहीं होता जब तक आप अन्दर से सहनशील नहीं होते। अन्दर यदि सहनशीलता का भाव नहीं हुआ तो बाहर का अभिनय ज्यादा देर तक टिक नहीं सकेगा। जरा खरोंच लगते ही जैसे शरीर की त्वचा से खून छलक आता है इसी प्रकार जरा सा किसी का धक्का लगते ही आप उबल पड़ेंगे और चीख कर कहेंगे--अन्धे हो क्या ? दिखाई नहीं देता ?

जरा कोई आपका अपमान कर दे तो आप आपे से बाहर हो जाते है। कोई अपशब्द बोल दें तो आपका मूड उखड़ जाता है। कोई गाली दें तब तो आप खटिया खड़ी किये बिना मानने को राजी नहीं हो सकते। लेकिन जब तक आप खुद गाली लेने को राजी न हो तब तक कोई कैसे आपको गाली दे सकता है ? जब तक आप स्वयं ही अपमान स्वीकार न करें तब तक कोई कैसे आपका मान बिगाड़ सकता है ?सहनशीलता ऐसा सद्गुण है जो हमें व्यर्थ ही उत्तेजना, कुण्ठा और कुढ़न से बचाता है, तनाव से दूर रखता है। क्रोध और द्वेष से बचाता है।

महात्मा बुद्ध को एक व्यक्ति बहुत अपशब्द बोल कर चला गया और बुद्ध चुपचाप सुनते रहे। उस व्यक्ति को बड़ी आत्मग्लानि हुई और वह पशचाताप करता हुआ दूसरे दिन आकर क्षमा याचना करने लगा। महात्मा बुद्ध बोले क्षमा याचना की आवश्यकता नहीं क्योकि जो तुम कल  मुझे देना चाहते थे वह मैने लिया ही नहीं। फिर न मै आज वह हूँ जो कल था और न तुम ही वह हो जो कल थे। अतः गुजरी बात गुजर गई अब उस पर क्या सोच विचार करना। आज इस क्षण में हम जो है, जैसे है। वहीं है वैसे ही है अतः इस क्षण पर ही विचार करो और गुजरी बात भूल जाओ।

सहनशील होना कायर होना नहीं, गम्भीर और उदार होना है। विशाल ह्रदय होना है। हम तनाव रहित और द्वेष रहित हो सके इसके लिए हमे सहनशील होना ही पड़ेगा। यही मार्ग महापुरषों ने बताया है। जब कभी उत्तेजित या क्रोधित होने का मुकाम आए तब आप मुस्करा कर देखें। मान लीजिए, राह चलते गलती से किसी का धक्का आपको लग गया और आप गुस्सा नहीं हुए। मुस्करा कर बोले --कोई बात नहीं, तो वाकई बात वहीं खत्म हो जाती है और आप हल्के फुल्के बने रहते है। इन बातों को अपने जीवन में अजमा कर देखिये थोड़ा मुश्किल जरूर है पर कोशिश करके देखिये।

धैर्य (सब्र)

आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि धैर्य का फल मीठा होता है। यह कहावत बहुत गहराई रखती है और गहरे अनुभवों के बाद कही गई है। धैर्य बहुत बड़ा बल और उतावलापन याने अधैर्य बहुत बड़ी निर्बलता है। जो व्यक्ति धैर्य रखते है वे अपने लक्ष्य को पाने में जुटे रहते है, निरन्तर प्रयतन करते रहते है और अन्त में अपना लक्ष्य पाने में सफल होते है। पहिया चलता रहे तो गाड़ी मंजिल तक पहुंच ही जाती है। धैर्य ही वह पहिया है जो बंद न हो, जिसकी गति क्रम टूटे नहीं तो यात्री अपनी मंजिल प् लेता है। इसमें देर भले ही हो सकती है पर अन्धेर नहीं हो सकता। 

कुछ कार्य सरल होते है झट से हो जाते है कुछ कार्य कठिन होते है और मुश्किल से हो पाते है, जबकि कुछ कार्य बहुत कठिन और समय साध्य होते है जिनके सम्पन्न होने में समय लगता ही है और ऐसे कार्यो में धैर्य की जरूरत पड़ती है क्योकि धैर्य होगा तो ही हम निरन्तर प्रयत्शील रह सकेंगे वरना धैर्य छूट जाने पर निराश होकर काम छोड़ देंगे। धैर्य और साहस परस्पर मित्र है और किसी भी गाड़ी के दो पहियों की भाती है। इन दो पहियों में यदि 'स्थिर बुद्धि ' की धुरी (एक्सिल) लगी होगी तो पहिये बराबर घूम सकेंगे। एक्सिल स्लिप हो जाए या टूट जाए तो गाड़ी आगे न बढ़ सकेगी। इसलिए धैर्य बना रहे इसके लिए स्थिर बुद्धि का होना बहुत जरूरी है बुद्धिहीन धैर्य नहीं रख पाते या यू कह लीजिए कि धैर्य हीन होना बुद्धिमानी नहीं। धैर्य टूट जाना वैसा ही होता हे जैसे कोई रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ रहा हो और अधबीच में धैर्य रूपी रस्सी टूट जाए। ऊपर तक पहुंचने के लिए धैर्य रूपी रस्सी न टूटना अनिवार्य है बार बार प्रयतन करना हमें सफल कर ही देता है। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब हम धैर्य धारण किए रहे। 

इसलिए चलते रहने पर ही हम मंजिल तक पहुंच सकते है। चलते रहना ही जीवन का नाम है, रुक जाना मृत्यु है। सक्रियता जीवन है निष्क्रियता मृत्यु है। पुरुषार्थ जीवन है आलस्य मृत्यु है। धैर्य जीवन है अधैर्य मृत्यु है। यही हमारे जीवन की सफलता और उन्नति का मूल मन्त्र है। मनु महाराज ने धैर्य की गणना धर्म के दस लक्षणों में की है और "धरतीति स धर्मः " के अनुसार धर्म वही है जो धारण किया जाए अतः धैर्य का धारण करना धर्म और धारण न करना अधर्म होगा। 

विपत्ति के समय धैर्य ही हमारा सबसे बड़ा मित्र सबसे बड़ा बल और सबसे जरूरी सहारा होता है और संकट के समय धैर्य की परीक्षा भी हो जाती है। अतः हमें धैर्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए तभी हम जीवन की कठिन रहो पर, सच्ची और हितकारी राहों पर कदम बढ़ाते रह सकेंगे और कठिनाइयों व संघर्षो पर विजय पा सकेंगे। महापुरषों ने हमे यही रह दिखाई है और कहा है --

 न्याययातपथः प्रविचलन्ति पंद न धीराः। 

जो धीर अर्थात धैर्यवान होते है उनके कदम न्याय मार्ग पर चलते हुए डगमगाते नहीं, विचलित नहीं होते।

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मै अपने इस आर्टिकल में जीवन में सहनशीलता और धैर्य के विषय में बता रही हूँ जो की आज के युग में जिन माननीय गुणों की प्रायः हममें कमी होती जा रही है।