सुखी जीवन कैसे जिएं?

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hello दोस्तों आज मेरा आर्टिकल सुखी जीवन कैसे जिए ? टॉपिक पर है।मनुष्य सुखी हो दुख से दूर रहे यह चाहता तो है पर इसके लिये पूरी तरह से प्रयत्न नहीं करता और जो करता भी है तो गलत ढंग और विपरीत दिशा में करता है लिहाजा दुखी होता रहता है।

दोस्तों इस आर्टिकल में बड़े सरल और व्यवहारिक ढंग से सुखी जीवन कैसे जिएं, इस विषय पर युक्ति युक्त प्रकाश डाला गया है।

सभी लोग जानते है की हर आदमी सुख चाहता है। दुख कोई नहीं चाहता और यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि दुख जब तब बिना बुलाये आता रहता है। 

परन्तु सुख के पीछे निरन्तर भागने वालों को भी सुख के दर्शन कभी कभार ही हो पाते है और वह भी स्थायी नहीं होता। सुख आता है और भाग जाता है।

इसके कारण पर विचार करने से पता चलता है कि दुख और रोग भगवान ने हमारे लिये नहीं बनाये बल्कि यह सब हमारे दोषों और असंयम के परिणाम स्वरूप आते है।

लेकिन हम अपने अहम् की सुरक्षा में इनका कारण ईश्वर को मानते है।

विद्वानों के मतानुसार दुःखों को पाँच भागों में बांटा जा सकता है  

(1)इन्द्रियों मे थकावट, (2) दूसरा शरीर में रोग, (3) मन में चिन्ता, (4) बुद्धि में भय, (5) अहं में वियोग। अब देखना यह है कि हमारा क्या दोष है।

हमारा दोष है समाज में प्रचलित गलत मान्यताओं और धारणाओं को सही मानकर उन पर चलते जाना। यह निश्चित है की हमारी मान्यता और धारणा भ्रमक होगी। तो उसके अनुसार हमारे कर्म भी गलत होंगे जिसका नतीजा दुख होगा।

वे गलत मान्यताएं और धारणाएं क्या है? वे है चाय में चुस्ती, भोजन में शक्ति, पैसे में सुख, पुस्तकों में ज्ञान और निकट सम्बन्धियों से अपनापन मानना। अब जरा इन पर बारी बारी से विचार करें।

(1) चाय में चुस्ती का भ्रम

चाय एक प्रकार से हल्का मादक पदार्थ है जिसका प्रयोग समाज में बिना सोचें समझे पेय के रूप में अन्धाधुन्ध हो रहा है।

यहां तक कि बच्चों को पैदा होते ही चाय पिलाने लगते है यह मान कर कि यह सर्दी को दूर करती है और फुर्ती लाती है।

यह केवल भ्रम है क्योंकि दूसरे मादक पदार्थो की तरह चाय उत्तेजना जरूर लाती है पर बाद में ढीला पन आने लगता है इससे बार बार इसको पीने की इच्छा होती है।

डॉक्टरों की नवीन खोज से पता चला है कि चाय में लगभग एक दर्जन विष एक साथ रहते है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होते है।

कोई तो नींद को कम करता है, कोई भूख मारता है, कोई तेजाब यानी अम्ल पैदा करता है, कोई रक्त-चाप तो कोई नसों को ढीला करता है।

आजकल गेस्ट्रिक ट्रबल की शिकायत बहुत अधिक है। इसमें चाय की भूमिका एसिड (अम्ल) बनाने की वजह से महत्वपूर्ण है।

डॉक्टरों का कहना है कि जितना जिस व्यक्ति में तेजाब अधिक बनेगा वह उतना ही जल्दी थकेगा और जल्दी रोगी व बूढ़ा होकर जल्दी मरेगा।

पेट में और भी पदार्थ तेजाब बनाते है जैसे -मांस, मिर्चमसाला, अचार, मिल की बनी चीनी, दाले आदि। परन्तु दाले फिर भी उतना ही तेजाब बनाती है। 

जितने की हमारे शरीर को आवश्यकता है। फालतू तेजाब ही हानिकारक है। हमारा रोजाना का अनुभव है कि चाय के आदी लोग जवानी में ही थकने लगते है।

जब तक चाय में चुस्ती का भ्रम बना हुआ है तब तक हम चाय पीना कैसे बन्द कर सकते है

(2) भोजन में शक्ति का भ्रम

दूसरा भ्रम भोजन में शक्ति का है जो कि ठीक नहीं। भोजन शक्ति के लिये नहीं शरीर का निर्माण करने के लिये आवश्यक है।

यही कारण है कि अधिक खाने वाले और परिश्रम न करने वाले लोग अक्सर मोटापे के शिकार हो जाते है और कम खाने वाले दुबले हो जाते है। 

पर देखने में आता है कि मोटे शरीर के लोग अक्सर कमजोरी की शिकायत करते हैऔर दुबले पतले लोग चुस्त बने रहते है।

काम काज करने से हमारे शरीर के जितने सेल्स टूटते है उनका नवनिर्माण करने के लिये भोजन आवशयक है। इसलिए जितना किसी का अधिक परिश्रम का काम हो उतना अधिक भोजन और जितना परिश्रम कम हो उतना भोजन भी कम करना चाहिए।

दूसरी बात यह है कि भवन निर्माण के समय जैसे चूना, गारा, ईट आदि की अधिक जरूरत होती है इसी तरह शरीर का निर्माण हो रहा हो तो अधिक भोजन कि आवश्यकता होती है। 

परन्तु शरीर का पूरा निर्माण हो चुकने पर, बिना परिश्रम किये अधिक खाना रोगो को बुलावा देना है।

जिन लोगों को यह भ्रम हो की भोजन से शक्ति मिलती है उनको एक प्रयोग करके देखना चाहिए। किसी स्वस्थ्य नौजवान को उसकी मनमर्जी का पौष्टिक भोजन जितना चाहे (1 सप्ताह) खिलाते रहे और सोने को मना कर दें। 

तो आप देखेंगे कि वह व्यक्ति काम करने लायक नहीं रहेगा। अगर भोजन में शक्ति होती तो उसका शरीर ढीला नहीं पड़ता। 

शक्ति सीधी भगवान से मिलती है जब हम गहरी नींद में होते है। गहरी नींद में हमारे अहंकार का विलय होने से ईश्वर से सीधा सम्पर्क हो जाता है, हमारे शरीर की बैटरी चार्ज हो जाती है। 

हम प्रातः एकदम पूरी ताजगी लिए हुए उठते है। इसके विपरीत अगर गहरी नींद नहीं आती तो शरीर थका थका सा रहता है और काम करने को मन नहीं होता।

योगी लोग ध्यान व समाधि द्वारा अधिक शक्ति प्राप्त करते है अगर भोजन में ही शक्ति होती तो उपवास करने वाले कुछ भी न कर सकते।

मेरा अपना अनुभव है कि 10-15 दिन बिना खाए नींबू शहद, पानी या फलों पर रहा जा सकता है और रोजाना का काम भी किया जा सकता है।

इससे सिद्ध होता है कि भोजन शरीर का निर्माण तो अवश्य करता है परन्तु शक्ति भगवान की देन है। भोजन में शक्ति मानने वाले लोग प्रायः जरूरत से अधिक और श्रम से पहले खाते है जिसके कारण वे आगे रोगी होकर कष्ट भोगते है।

(3) पैसे में सुख का भ्रम

तीसरा भ्रम पैसे में सुख का है।अगर पैसे में सुख होता तो धनवान लोग दुखी नहीं होते परन्तु देखने में आया है कि जितना बड़ा धनवान उतनी बड़ी चिन्ता।

आप धन से सुख के साधन तो खरीद सकते है परन्तु सुख नहीं खरीद सकते। पैसे से स्वादिष्ट भोजन खरीदा जा सकता है परन्तु भूख नहीं।

पुस्तक खरीद सकते है परन्तु ज्ञान नहीं। टॉनिक खरीद सकते है शक्ति नहीं। औषधि खरीद सकते है परन्तु स्वास्थ्य नहीं खरीद सकते। 

जो लोग इस भ्रम में है कि पैसे में सुख है वह हर जायज नाजायज़ साधन से धन बटोरने के पीछे पड़े है। किसी संत ने कहा है की बिना बेईमानी के धन इकट्ठा नहीं होता और साथ भी नहीं जाता है।

परन्तु धन यही पड़ा रह जाता है। धनी आदमी चिंता मुक्त नहीं हो सकता।

(4) किताबी ज्ञान का भ्रम

यह चौथा भ्रम है जबकि सत्य यह है कि पुस्तकों से जानकारी तो मिलती है परन्तु ज्ञान नहीं मिलता। आपने पुस्तक में पढ़ा कि चीनी मीठी वस्तु है। 

परन्तु चीनी खाये बगैर उसकी मिठास का वास्तविक ज्ञान (अनुभव) नहीं हो सकता।  कोई व्यक्ति तैरने के बारे में कितनी ही पुस्तकें पढ़ लें परन्तु पानी में उतरे बगैर तैरना नहीं सीखा जा सकता।

योगियों के अनुसार जब विचारों का निरोध होता है तो भीतरी ज्ञान पैदा होता है जैसे कबीर, तुलसी, सूरदास कही किसी विश्वविद्यालय में पड़ने नहीं गये परन्तु उनको सब ज्ञानी मानते है। 

इतिहास हमें बताता है कि अकसर सन्त अधिक पढ़े लिखें नहीं होते थे परन्तु भीतरी ज्ञान से ओत-प्रोत होते थे जैसे गुरुनानक देव जी, कबीर दास जी ने तो कहा है कि मसि कागज से छुओ नाहीं अर्थात पढ़ाई लिखाई नहीं की।

अगर पुस्तकों में ज्ञान होता तो कॉलेजों के प्रोफेसर और अधिक पढ़े लिखें लोग सब ज्ञानी होते परन्तु ऐसा है नहीं। जिस विषय को कोई पढ़ लेता है। 

वह सैद्धांतिक रूप से उसका जानकार तो हो जाता है परन्तु व्यवहारिक रूप से उसे ज्ञानी की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

(5) अपनत्व का मोह

 पांचवां भ्रम सम्बन्धियों में अपनत्व का है। अगर माता-पिता, भाई-बहन आदि हमारे होते तो हमें छोड़कर नहीं जाते।

अपना तो वह है जो कभी पैदा नहीं होता, कभी मरता नहीं हमसे अलग नहीं होता। जो लोग केवल सम्बन्धियों को अपना मानते है। 

वे ही लोगों के मिलने और बिछुड़ने से सुखी व दुखी होते रहते है। जो केवल प्रभु को अपना सर्वस्व मान लेता है वह कभी दुखी नहीं होता।

इन दुःखों से छुटकारा कैसे पाए 

अब विचार यह करना है कि इन दुःखों से छुटकारा कैसे पाए तो पहले ये समझ लें कि दुख सदा अपने किसी न किसी दोष का ही परिणाम होता है।

अतः हमको सावधान होकर अपने दोषों को देखना चाहिए और उनसे बचना चाहिए। सन्तों ने इसके लिए निम्न लिखित पांच उपाय बताये है। 

(1) सन्तुलित आहार, (2) युक्ति युक्त उपवास, (3)विवेकपूर्ण सेवा, (4)विधिवत ध्यान और (5) प्रभु को अर्पित।दुःखों से छुटकारा तथा शाश्वत सुख प्राप्ति हेतु 'आत्म संयम योग ' का उपदेश अपने प्रिय सखा अर्जुन को देते हुए, भगवन श्रीकृष्ण कहते है। 

युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।

युक्त स्वपनाव बोधस्य योगो भवति दुःखहा।।   

अर्थात यथा योग्य आहार विहार और कर्मों की चेष्टा, सोना जागना आदमी अगर साध लेता है तो उसे दुःख दूर करने वाले इस योग की प्राप्ति होती है।              

(1) सन्तुलित आहार 

पूर्व में बताया जा चुँका है कि भोजन परिश्रम के बाद करना चाहिए और अपनी अवस्था के अनुरूप श्रम के हिसाब से करना चाहिए।

अखाद्य और मादक पदार्थो को सर्वदा त्याग देने पर रोगों से बचा जा सकता है। विद्वानों का मत है कि बीमार होकर औषधि और संयम बरतने के बजाये यदि पहले ही संयम से काम लिया जाये तो रोग आ ही नहीं सकते।

(2) युक्ति युक्त उपवास 

उपवास का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है दुखों से छुटकारा दिलाने में। साधारणतया उपवास का अर्थ होता है। 

शारीरिक संयम तथा मानसिक सत चिन्तन द्व्रारा भगवान की गुण लीला और कीर्तन आदि में अपने को तल्लीन रखने के लिये ही प्रयोग में लाया जाता है। 

आम तौर पर उपवास शब्द का प्रयोग कुछ न खाने या सुष्म मात्रा में खास प्रकार का (फल दूध आदि) भोजन लेते हुए भी किया जाता है।

जिसका उददेश्य शारीरिक स्तर पर सुन्दर स्वास्थ्य लाभ तथा आध्यात्मिक स्तर पर भगवान की कृपा और कभी न चुकने वाले सुख की प्राप्ति ही होता है। 

अतः सन्त महात्माओं ने अपने दीर्घ कालीन मनन चिन्तन और तप तथा स्वाध्याय के द्वारा प्राप्त अनुभव के आधार पर मानव जाति को नाना प्रकार के क्लेशों से उबरने हेतु युक्ति युक्त उपवास का साधन बताया है।

संसार में जितने भी बड़े बड़े सम्प्रदाय है सब में किसी न किसी रूप में उपवास का विधान है बल्कि उपवास के साथ खास प्रलोभन जैसे धन, वैभव, यश, कीर्ति और सब प्रकार के सुख की प्राप्ति आदि भी जोड़ दिये गये हैं।

जिससे मनुष्य उपवास अवश्य करें और स्वस्थ बने रहें। हर साल रमजान के महीनें में पूरे एक महीनें मुस्लिम रोज़े की शक्ल में उपवास करते है। सबसे अधिक और कठिन उपवास जैनियों में होते है।

हिन्दुओं में हर महीने ही, दिन (रवि सोम मंगल गुरुवार आदि)तिथि (तीज चौथ अष्टमी एकादशी प्रदोष पूर्णिमा अमावस्या आदि) पर व्रत उपवास तो चलते ही रहते है। 

पर साल में दो बार ऋतु परिवर्तन काल के 9 दिन की अवधि के दो नवरात्र पर्व (एक वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु के आरम्भ में शारदीय नवरात्र तथा दूसरे जाड़ों के बाद गर्मी की शुरुआत के समय चैत्र के नवरात्र) विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इन व्रत उपवासों के फलस्वरूप हमारा पेट भी साफ हो जाता है और शरीर रोग रहित हो जाता है परन्तु उपवास रखने का रूप बदल जाने के कारण इतना लाभ नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए।

लोग उपवास में दूध, दूध की मिठाई, आलू, शकरकन्द फल, मेवे की खीर आदि लेते है और इस प्रकार पेट खाली न रहने के कारण शरीर की सफाई नहीं हो पाती।

वास्तव में उपवास की विधि यह है कि नवरात्र पर बिल्कुल कुछ न खाया जाए। थोड़ा थोड़ा जल आवश्यकता अनुसार लिया जा सकता है।

जल में नींबू का रस व एक दो चम्मच शहद भी लें सकते है जिनसे एकदम ऐसा उपवास न सध सके वे कुछ दिन खाली सब्जी खाकर रहें।

फिर कोई कच्चा पक्का फल जैसे अमरुद, टमाटर, खीरा, ककड़ी, आम इत्यादि। इसके बाद कुछ दिन सब्जियों के सूप या फलों के रस पर रहा जाए। जब अभ्यास हो जाए तो फिर जल शहद और नींबू पर रहा जाए।

भारत तो योगियों का देश विशव भर में प्रसिद्ध हे जहां बड़े बड़े योगी पर्वतों की कंदराओं में दीर्घकालीन समाधि लगाते रहते है।

जिसमें कुछ भी तो खाने पीने का पोर्शन नहीं उठता। जैन सम्प्रदाय के लोग तो एक महीने तक का उपवास कर लेते है।

इससे सिद्ध होता है कि शक्ति सीधी परमात्मा से मिलती है और भोजन शरीर का निर्माण अथवा सिर्फ टूट फूट की मरम्मत का काम करता है।

(3) विवेक पूर्ण सेवा

इसे पंच स्तरीय साधन की बीच की सीढ़ी की संज्ञा दी जा सकती है जो हमें सफलता की और लें जाने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इन्द्रियों को थकावट से बचाने और शरीर को रोगो से बचाने के विषय में पीछे बताया जा चुका है अब जरा मन की अशान्तिको लें।

यह भी एक मानसिक रोगी ही है और मेरा विशवास है कि अशान्ति केवल हमारे स्वास्थ्य भरे क्रिया कलापों का समुचित दंड है। 

अपने पैदा होने के समय से ही हम जिस समाज से अपनी आवश्यक्ताओं की पूर्ति का शुभारम्भ करते है उसकी सेवा की ओर भी क्या हमारा ध्यान जाता है ? 

यदि भली भाती विचार करें तो यह पता चलेगा कि जिस भोजन और वस्त्र के बिना हमारा गुजारा नहीं उसे बनाने और जुटाने में बहुत सारे लोगों का श्रम लगता है। 

जहां जिन स्कूल कॉलेजों में हम पढ़े लिखे है उनके निर्माता और सम्यक व्यवस्था में कई शिक्षा प्रेमी सज्जनों का श्रम व धन लगा होगा।

अपना जीवन गुजारने के लिए धन भी हमको समाज से ही मिलता है परन्तु हम है कि समाज सेवा के नाम पर समाज को अंगूठा ही दिखाये रहते है।

हम न तो समाज के नाम पर और न भगवान के नाम पर ही कुछ खर्च करने को राज़ी होते है। 

जैसे शरीर में मल इकट्ठा होने पर रोग अवश्यम्भावी है उसी प्रकार घर में अधिक धन एकत्र होना भी खतरे और दुश्चिन्ता की पहचान है। इसीलिए किसी कवि ने कितना सुन्दर भाव व्यक्त किया है इस दोहे में ---

पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम। 

दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम।।

अतः अपनी जीवन नैया को डूबने से बचाने के लिये, उसमें तेज़ी से भरते जा रहे धन रूपी जल को जल्दी जल्दी उलीचते जाने में ही हमारी सुरक्षा व भलाई निहित है। 

हमारे धर्म शास्त्रों में अपनी कमाई का दशमांश निकालने और उसे समाज सेवा में खर्च करने का विधान है। इस्लाम में जकात इसलिए निकालने को लिखा है और ईसाई धर्म में भी दान और सेवा पर बड़ा बल दिया गया है। 

परन्तु आज इस और से मानव का ध्यान हट गया है। हम लोग सुख पाना तो चाहते है परन्तु किसी को सुख देना नहीं चाहते इसीलिए हमेशा सुख से वंचित रहते है। किसी कवि ने कितना सुन्दर कहा है ---

चार वेद छह शास्त्र में, बात मिली है दोय।

सुख दीन्हे सुख होत है, दुख दीन्हे दुख होय।।

अतः सुख और शान्ति के लिये यह जरूरी हे कि हम मिल बांट कर खाये और अपने व्यक्यिगत स्वार्थ का परित्याग करते हुए समाज सेवा में रूचि पैदा करें। जऱा विचारिये।

अगर हम अपनी आमदनी का दसवां भाग भोजन का चौथाई भाग और समय का 1 घंटा समाज सेवा में लगाने लगे तो धन में और भोजन में आसक्ति समाप्त हो जाती है और चिन्ता जड़ मूल से चली जाती है। 

यह मेरे कई मित्रों का निजी अनुभव है। सुख बाटने से ही मनुष्य सुखी हो सकता है यही ध्रुव सत्य है। हमें अपने को सरिता के समान उदार बनाना चाहिए।

(4) विधिवत ध्यान 

पंच स्तरीय साधना का चतुर्थ सीढ़ी है विधिवत ध्यान। महर्षि पतंजलि ने "योगशिचत्त वृत्ति निरोधः" यानि चित्तवृत्तियो के निरोध को ही योग की संज्ञा दी है। 

जिसके अभ्यास से मन को विमल(मलरहित) करके ध्यान द्वारा समाधि की अवस्था तक पहुंचा जा सकता है। यह मल शारीरिक और मानसिक दो स्तरों वाला होता है।

शरीर और इन्द्रियों में मल होने पर नींद आ जाती है तथा मन में मल होने से वह एकाग्र नहीं हो पाता, इधर उधर भागता फिरता है। 

इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि संतुलित आहार, युक्ति युक्त उपवास और विवेक पूर्ण सेवा द्वारा शरीर इन्द्रियों और मन को मल रहित किया जाए। 

प्रातः काल उठकर दैनिक नित्य कर्मो से निवृत्त होकर स्नान करके एकांत शान्त स्थान में थोड़ी ऊंची जगह या तखत पर या चटाई बिछाकर कमलासन, सिद्धासन अथवा सुखासन में से किसी एक ऐसे आसन से बैठना चाहिए। 

जिस पर बिना कष्ट के ज्यादा समय तक बैठा जा सके। थोड़े दिनों के अभ्यास से यह हो जायगा साधना के से आसपास का वातावरण शान्त होना चाहिये। 

भगवान के किसी नाम या रूप अथवा दोनों पर मन को एकाग्र करना चाहिए। इसी एकाग्रता की अवस्था के बाद की स्थति ही समाधि की वह अवस्था होती है। 

जब ध्यान करने वाला और जिस पर ध्यान लगाया जाता है दोनों लुप्त हो जाते है। जिसका आनन्द गूंगे के गुड़ की तरह केवल अनुभवगम्य है। 

वाणी और शब्दों द्वारा उसे व्यक्त कर पाना सम्भव ही नहीं है। यह साधन दीर्घ काल तक निरन्तर कठिन अभ्यास द्वारा ही सध पाता है।

(5) प्रभु अर्पित 

पंचम और अन्तिम स्वतन्त्र स्तर साधना प्रभु के प्रति सर्व भावेन आत्म समर्पण है। जो लोग श्रीमद्भ्गवद गीता पढ़ते सुनते है उन्हें मालूम है। 

कि गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मोह से मुक्त होकर कर्तव्य पालन करने और अनासक्त कर्म करने का उपदेश दिया तथा कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञान योग के मार्ग से आत्म कल्याण करने तथा ब्रह्मा में लीन होने का सन्मार्ग बताया। 

सब कुछ प्रभु अर्पण करके इस जीवन लीला को एक अभिनय मानकर ईशवर की इच्छा को ही अपनी इच्छा मानकर जो जीवन जीता है। 

अपने कर्त्वयों का विधिवत्त पालन करता है वही दुख से बचा रह पाता है। जैसे कीचड़ में पैदा होने वाला कमल पानी में ही फलता फूलता है और सदैव पानी में ही रहता है। 

फिर भी उस पर पानी की एक बूंद भी ठहरती नहीं और वह पानी से अलिषत रहता है इसी तरह हमें भी संसार सागर में रहते हुए, अपने कर्तव्य करते हुए सब कुछ प्रभु का समझते हुए ही इस जीवन का निर्वाह करना चाहिए तभी हम दुखों से बच सकेंगे।


आपने इस आर्टिकल को पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद करते है | कृपया अपनी राये नीचे कमेंट सेक्शन में सूचित करने की कृपा करें | 😊😊

पुष्पों (फूलों) द्वारा होने वाले स्वास्थ्य लाभ

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दोस्तों आज में आपको इस आर्टिकल में पुष्पों (फूलों) द्वारा होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में बताउंगी।कोण सा पुष्प किस प्रकति का होता है और उसके गुण क्या है।

स्वास्थ्य संम्बन्धी विषय में उसका किस प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है।आशा है की इस आर्टिकल में बतायी गई जानकारी आप सबको रोचक व उपयोगी प्रतीत होगी।

किसी हरे भरे पुष्प पल्ल्वीत उद्यान में प्रवेश करने पर कौन ऐसा व्यक्ति होगा जिसका मन वहां प्रवाहित मंद -मंद खुशबु से प्रफुलित न हो उठेगा।

परंतु ये कहा जाय की ये मानव हृदय में खुशबु ही प्रफुलित नहीं करते बल्कि अनेक रोगो में भी लाभदायक होते है। अधिकांश व्यक्ति सहज ही विश्वास नहीं करेंगे किन्तु यह कल्पना नहीं वास्तविकता है।

विशव के अनेक देशों में हुए अनुसंधानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है की इन सुमन-किसलयों की सुगंध में किसी ब्राह्म औषधि की अपेक्षा अनेक रोगों के उपचार की अद्भुत क्षमता विधमान है।

संभवता सुगंध चिकित्सा पद्धति से हमारे प्राचीन ऋषिगण परिचित थे तभी आयुर्वेदिक ग्रंथो में उन्होंने पुष्पों के गुण व उपयोग के विषय में विस्तार से चर्चा की है।

पुष्प-सुगंध का मानव के जीवन पर उनके दीर्घ जीवन के लिए काफी प्रभाव पड़ता है।शवेत चटक रंग वाले बेला तथा चमेली के पुष्प न केवल पूजन में ही प्रयुक्त होते है।

अपितु इसकी वेणी बना कर नारियाँ अपनी केश सज्जा करती है, इसकी माला बनाकर लोग गले में धारण करते है। जल को सुवासित बनाने के लिए इसके 4-6 फूल घड़े में व जलपात्र में डाले जाते है।इसकी सुगंध मनमोहक होती है। 

चमेली का पुष्प (फूल) से लाभ 

Jasmine

(परिचय)

 यह लता जाती की बेल है। इसके फूल छोटे कोमल और पंखुड़ियों वाले होते है। यह सफेद और पीले रंगों में दो प्रकार की होती है। इसकी मस्त सुगन्ध ह्रदय को बहुत प्यारी लगती है अतः संस्कृत में इसे ह्रदय गंधा भी कहते हैं।

(गुण)

यह कड़वी, गरम, कसैली, हल्की दोषों का शमन करने वाली है। मस्तक रोग, नेत्र रोग, मुख रोग, दांत दर्द वात तथा रक्त विकार को नष्ट करती है।

इसके पत्ते चबाने से दाँतो का दर्द मिटता है। दांत व मसूड़े मजबूत और विकार रहित होते हैं। मुह के छाले ठीक होते है। गले की खराश ठीक होती है। इसकी सुगंध सूंघने से सिर का भारीपन और दर्द दूर होता है।

(प्रयोग)

इसके पत्ते और फूलों को चिकित्सा हेतु प्रयोग किया जाता हैं। इसके फूलों का काढ़ा 2 तोला और चूर्ण 1 से 3 ग्राम तक की मात्रा में प्रयोग किया जाता है।

इसका तेल भी बनाया जाता है, जिसमें फूलों के गुण होते है। चमेली का तेल सिर के बालों  में लगाने से सिर में तरावट और नेत्र ज्योति में ताकत आती है। 

चमेली की जड़ को पानी के साथ पत्थर पर घिसकर गाढ़े लेप को दाद पर लगाने से दाद अच्छी हो जाती है। घाव पर चमेली के पत्ते पीस कर गर्म करके पुल्टिस बाँधने से घाव भर जाता है।

गुलाब का पुष्प (फूल) से लाभ 

Rose

(परिचय)

गुलाब एक ऐसा पौधा है जो बाग बगीचों बंगलो के अहातों और घर के आंगनों में देखा जा सकता है। संस्कृत में इसे महाकुमारी भी कहते है।

क्योंकि इसके पुष्प में केशर, मकरन्द गर्भाश्य सब होते है पर गर्भाधान नहीं होता क्योंकि फूलों में बीज नहीं होता अतः इसकी डाली से इसकी कलम लगाई जाती है।

इसे शतपत्री इसलिए कहा गया है क्योंकि एक फूल में 100 पंखुड़ियां होती है। यह सफेद, हल्का गुलाबी लाल और काले रंगों में होता है।

इसकी सुगन्ध बहुत आनन्द दायक होती है। कुछ किस्में सुगंधहीन भी होती है। एक पौधे में ढेर सारे फूल लगते है। देशी गुलाब चैत्र वैशाख में फूलता है। चीनी (विदेशी) गुलाब के फूल बारह मास फूलते है।

(गुण)

यह शीतल, ह्रदय को प्रिय, ग्राही, वीर्य वर्द्धक हल्का, वर्ण को उत्तम करने वाला, कड़वा, चरपरा, पाचन करने वाला और रक्त विकार नष्ट करने वाला होता है।

(प्रयोग)

गुलाब के फूलों की पंखुडिया ही प्रयोग की जाती है।ठण्डाई के मिश्रण में इन पंखुड़ियों को मिलाकर उपयोग में लिया जाता है और पंखुड़ियों का गुलकन्द बनाया जाता है।

गुलकन्द तरावट ठन्डक और कब्जनाश करने वाला होता है। इसके फूलों का शर्बत भी बनाया जाता है जो की बहुत पौष्टिक रक्त शोधक और मन को प्रसन्न करने वाला होता है।

पित्त का शमन करने के लिए पित्त प्रकृति के लोगों को गुलाब का शर्बत पीना चाहिए। आँखो के लिए गुलाब जल बहुत गुड़कारी होता है।

सोते समय गुलाबजल की 2-2 बूंदे दोनों आंखो में डालने से आंखो में ठंडक होती है। जिन महिलाओं को पित्तज प्रदर की शिकायत हो उन्हें दूध में मिश्री और गुलाबजल डालकर पीने से बहुत लाभ होगा। 

यह सिर्फ दो पुष्पों का परिचय जानकर आप पुष्पों की उपयोगिता समझ चुके होंगे। आपने इस आर्टिकल को देखा इसके लिए आपका धन्यवाद करते है | इसमें दिए गए नुस्खो को प्रयोग कर परिणाम नीचे कमेंट में सूचित करने की कृपा करें | 😊😊 

अमरुद से होने वाले घरेलू इलाज

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amrud

दोस्तों आज में अपने इस आर्टिकल में आपको अमरुद से होने वाले घरेलू इलाज के बारे में बताउंगी। अमरुद एक सस्ता और स्वादिष्ट फल होता है। इसे कच्चा भी खाया जाता है और सब्जी के रूप में भी। मै यहां इसका औषधि रूप में परिचय देते हुए इसके कुछ विभिन्न प्रयोग प्रस्तुत कर रही हूँ जिनसे कुछ व्याधियों को दूर किया जा सकता है और इस प्रकार अमरुद को घरेलू इलाज में प्रयोग कर लाभ उठाया जा सकता है।

अमरुद से होने वाले घरेलू इलाज 

(सर्दी)

 रुका हुआ जुकाम ठीक करने में अमरुद का जवाब नहीं। जुकाम रुक कर ठस हो जाए तो बिना बीज के एक अमरुद का गुदा खाकर ऊपर से एक गिलास पानी पीने से जुकाम बह निकलता है। पानी पीते समय नाक के दोनों नथुने बंद रखना चाहिए और पानी पीने के बाद छोड़ी जाने वाली सांस मुंह से फेकना चाहिए नाक से नहीं। इस प्रकार 2-3 प्रयोग एक दिन में करना चाहिए। यदि जरूरत हो तो दूसरे दिन भी यह प्रयोग करें। जुकाम बहने लगे तब बंद कर दे। 1-2 दिन जुकाम खूब निकल जाए तब रात को 50 ग्राम गुड़ खाकर बिना पानी पिए सो जाए। जुकाम ठीक हो जाएगा।

(खांसी)

एक पूरा अमरुद आग में भून कर 2-3 दिन खाने से खांसी का कफ निकल जाता है और खांसी में आराम हो जाता है। अमरुद के नरम 5-6 पत्ते लेकर पानी से धोकर पानी में चाय की तरह उबालें और दूध चीनी डालकर चाय की तरह छानकर पीने से खांसी में आराम होता है।

(कब्ज़)

अमरुद खूब खाने से मल चिकना व ढीला होता है और कब्ज़ दूर होता है। पीसी सोंठ, काली मिर्च और सेंधा नमक अमरुद में मिलाकर खाने से पेट का अफरा, गैस और अपच नष्ट होते है। अमरुद की कोमल पत्तियों को पत्थर पर पानी में पीसकर छान लें व पी जाएं इससे पेट दर्द में लाभ होता है।

अमरुद के पत्तों से होने वाले घरेलू इलाज

(दांत दर्द)

पत्तों को चबाने और पत्तों को उबाल कर इस पानी से कुल्ला करने से दांत दर्द बंद होता है और मसूड़ों की सूजन व पीड़ा मिट जाती है।

(गठिया)

गठिया बाय से होने वाली सूजन पर पत्तों को पीस कर लुगदी रखकर लेप करने से सूजन उतर जाती है।

(बवासीर)

खूनी बवासीर में अमरुद के 8-10 पत्ते और अमरुद की छाल 10 ग्राम पानी में डालकर रात भर रखा रहने दें। सुबह इस पानी को इतना उबालें की चौथाई अंश बचे तब उतार कर छाल व पत्तों को मसल कर छान कर पीने से कुछ दिनों में ही खूनी बवासीर ठीक हो जाती है और खून आना बंद हो जाता है।

(पुराने दस्त)

पत्तों को उबालकर पीने और लगातार कई दिनों तक ताजे पके व मीठे अमरुद खाते रहने से दस्त, आंतो की सूजन और घाव आदि में लाभ होता है। अल्सर वालों को 2-3 माह तक खूब मीठा पका हुआ अमरुद खाना चाहिए।

(कांच निकलना)

बच्चों को अक्सर गुदा मार्ग से कांच निकलने की शिकायत हो जाती है और कभी कभी बड़ो को भी। अमरुद के पत्तों को पीसकर इसकी लुगदी को गुदा के मुख पर रख कर बांधने से कांच निकलना बंद हो जाता है।

(अजीर्ण)

अमरुद के पत्तों का रस 1 तोला और थोड़ी चीनी मिला कर प्रतिदिन प्रातःकाल एक बार पीने से 7-8 दिन में अजीर्ण ख़त्म होकर पाचन शक्ति और भूख बढ़ जाती है।

(मुंह के छाले)

अमरुद के पत्तों को कत्थे के साथ पीसकर पान में रखकर चबाने से छालों में आराम मिलता है। अमरुद का निरन्तर सेवन करने से वर्ण साफ होता है ह्रदय को बल मिलता है।

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ग्लिसरीन के विविध प्रकार से उपयोग

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ग्लिसरीन

दोस्तों आज में इस आर्टिकल में आपको ग्लिसरीन के विविध प्रकार से उपयोग करना बताउंगी। ग्लीसरीन को उपयोग करने की कुछ हितकारी विधियाँ यहां प्रस्तुत की जा रही है। जिनका उपयोग कर लाभ उठाना चाहिए। ग्लिसरीन हमारे सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण उत्पादकों में से एक है ये मुख्य रूप से चेहरे की त्वचा को नमी देती है। लेकिन ग्लिसरीन को इस्तमाल करने के और भी कई तरीके है। ग्लीसरीन से आप सभी परिचित है अतः इसका परिचय देनें की आवश्यकता नहीं। इसके कुछ घरेलू प्रयोग प्रस्तुत है। 

ग्लिसरीन को प्रयोग करने की कुछ लाभकारी विधियाँ

(1) 50 ग्राम ग्लिसरीन में 10 ग्राम बोरिक पाउडर मिलाकर जीभ के छालों पर लगाने से छालों में आराम होता है। बोरिक पाउडर की जगह सुहागा भी पीसकर मिलाया जा सकता है। इसके साथ 10 ग्राम (1चम्मच) शहद मिलाने से इसकी गुडवत्ता और भी बढ़ जाती है। अकेला ग्लिसरीन लगाने से भी छालों के कष्ट में तुरन्तआराम मिलता है।

(2) त्वचा और होठों पर ग्लिसरीन लगाने से त्वचा और होंठ फटते नहीं। इससे शरीर और खास तौर पर पैरों पर मालिश करने से थकान मिटती है और त्वचा स्निगध रहती है।

(3) गले में खराश होने पर ग्लिसरीन की काडी लगाने से आराम होता है।

(4) कम्बल धोते समय पानी में 1-2 चम्मच ग्लिसरीन डालकर धोने से कम्बल मुलायम रहता है। ग्लासों पर ग्लिसरीन लगाने से एक के अन्दर एक फंसते नहीं और चमकदार साफ रहते है। स्टेम्प पैड की स्याही और प्रसाधन की चीजें ग्लिसरीन डालकर रखने से सूखती नहीं। थोड़ी रुई से फ्रिज, बर्तन, खिड़की के कांच और कपड़ो पर पड़े चाय, कॉफी के धब्बों पर ग्लीसरीन लगाकर रगड़ने से साफ हो जाते है। पेन लीक करता हो तो उसकी चूड़ियों पर थोड़ा सा ग्लिसरीन लगाकर वापिस बन्द करने से स्याही लीक नहीं होती। साईकिल के पहियों की रिम्स पर ग्लिसरीन लगा देने से जंग नहीं लगती।

(5) एक चम्मच ग्लिसरीन में 3 चम्मच कच्चा दूध मिलाए और रुई से अपने चेहरे पर लगाए। फिर इसे सूखने दे और चेहरे से हटा दे। इसके अलावा आप संतरे के रस में ग्लिसरीन को मिलाकर भी चेहरे की सफाई के रूप में उपयोग कर सकते है। ये एक अच्छा क्लींजर है जो की धीरे-धीरे आपकी त्वचा को भीतर से साफ करता है और त्वचा की गन्दगी व धूल को हटा देता है।

(6) एक अंडे का सफेद भाग, शहद और ग्लिसरीन सभी को लेकर 1-1 चम्मच मिला लें। इस मिश्रण को अपने चेहरे पर लगा लें। इसे लगभग 20 मिनट तक लगा रहने दे और फिर गुन गुन पानी से धो लें। ये एक अच्छा एंटी-एजिंग उपयोग है जो की विशेष रूप से झुर्रियों और उम्र बढ़ने के संकेतो में प्राचीन काल से ही लाभकारी रहा है।

(7) ग्लिसरीन के साथ सेब के सिरके को मिलाएं और अपने चेहरे पर इस मिश्रण को लगाये। इसे रात को सोते समय चेहरे को धोने के बाद ही लगाये। ये एक सबसेअच्छा टोनर है जो की त्वचा के अनुकूल है और बाजार के महंगे टोनर से सस्ता पड़ता है।

(8) थोड़ा सा शहद और ग्लिसरीन लेकर मिश्रण तैयार कर लें। इस मिश्रण को केवल अपने होठों पर लगाये और सूखने के बाद आप इसे रुई या टिशू पेपर की सहायता से साफ कर सकते है। यह उपाय आप तब तक कर सकते हो जब तक आपके होंठ नरम न हो जायें। ये होठों के लिये एक अच्छा मॉइस्चराइजर है। आप ग्लिसरीन की कुछ बूंदो को गुलाबी और मुलायम होठ पाने के लिये भी उपयोग कर सकते हो।

(9) 20 मिलीलीटर गुलाब जल, 2 बूंद ग्लिसरीन और 1 टेबलस्पून नींबू का रस मिक्स करके एक स्प्रे बोतल में स्टोर कर लें। इसको आप 1 महीने तक इस्तमाल कर सकते है, अगर आपकी ड्राई स्किन है तो आप विटामिन ई के केप्सुल मिला सकते है। ये एक बहुत ही अच्छा मेकअप सेटिंग स्प्रे है। आजकल मेकअप सेटिंग स्प्रे जिसमे काफी रसायन होते है, ये मार्केट में भी उपलब्ध है लेकिन आप घर पर ही प्राकृतिक चीजों का इस्तमाल करके मेकअप सेटिंग स्प्रे बना सकते है।

(10) 1 टेबल स्पून चीनी में जरा सी ग्लिसरीन मिक्स करें और इस मिश्रण को चेहरे पर स्क्रब करें। घर पर बनाये इस स्क्रब को आप चेहरे के अलावा शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी लगा सकते है। ये एक अच्छा फेशियल स्क्रब है जो की आपके चेहरे की डेड स्किन हटाकर आपके चेहरे पर निखार लाता हैं।

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नीम के गुणकारी प्रयोग

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neem
दोस्तों आज में अपने इस आर्टिकल में आपको नीम के गुणकारी प्रयोग बताउंगी जो हमारे लिए बहुत लाभकारी होते है। दोस्तों कहावत है कि-उपदेश की बातें और नीम की पत्तियां कड़वी होने पर भी गुण में उत्तम होती है। यहां कुछ गुणकारी विवरण प्रस्तुत है। नीम का उपयोग औषधि हेतु कई प्रकार से किया जा सकता है। नीम की दातूनदांत व मसूड़ों को स्वच्छ निरोग और मजबूत रखने में बेजोड़ है। इसकी पत्तियों को प्रयोग करने के कुछ तरीके प्रस्तुत है।

(नीम की सेवन विधियां)

(1) इन दिनों नीम की नई पत्तियां आती है। प्रातः घूमने के लिए जाए तब 20-25 कोंपलें तोड़ लें और साफ करके खूब चबाचबा कर खाएं। जब तक कोंपलें उपलब्ध रहें तब तक वह प्रयोग जारी रखें। यह बहुत ही गुड़करी प्रयोग है। 

(2) नीम की कोमल पत्तियों में इमली व गुड़ मिलाकर चटनी पीस लें और भोजन के साथ खाए। यह भी बहुत लाभकारी प्रयोग है। 

(3) नीम की पत्तियां पीस लें। इसमें जरा सा काला नमक व सेंधा नमक मिलाकर गोल बेल बराबर गोलियां बना लें। प्रतिदिन 2 गोली प्रातः समय सेवन करें। 

(4) नीम की 10 पत्ती और 5 कालीमिर्च मिलाकर पीस लें। यह एक खुराक है। ताजे जल के साथ प्रातः 1 गोली लें। 

(5) नीम की पत्तियों को पीसकर उसका रस निकाल कर एक कप में छान लें और थोड़ा सा शहद मिलाकर पियें।

(नीम की सेवन विधियों से होने वाले लाभ)

किसी भी उपाय से नीम का नियमित सेवन करने से सारे शरीर की शुद्धि हो जाती है। शरीर के दोष व विकार नष्ट हो जाते है। रक्त शुद्ध होता है, त्वचा रोग नष्ट होती है और शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति में भारी वृद्धि होती है। त्वचा का रंग साफ होने से वर्ण में निखार आता है। .दाद खाज एक्जीमा जैसे रोग कोसो दूर रहते है। नेत्रों की चमक व ज्योति बढ़ती है, चेहरा तेजस्वी होता है। पाचन शक्ति ठीक रहने से शरीर के अंगप्रत्यंग शक्तिशाली और फुर्तीले बने रहते है। शरीर में रोग के कीटाणु टिक नहीं पाते। ग्रीष्म ऋतु में इसके सेवन से लू नहीं लगती। गर्मी और प्यास में कमी होती है। तथा ग्रीष्म ऋतु का समय निरोग और स्वस्थ रहकर गुजारा जा सकता हैं।

(नीम के गुणकारी प्रयोग)

(1) नीम के बीज को सिरकें में पीस कर चेहरे पर लगायें और 1 घंटे बाद धोलें। नीम की पत्तियों को साफ करके पानी में उबालें। इस पानी से चेहरा धोया करें। इस प्रयोग से चेहरे पर झाई व मुंहासे नहीं होंगे और होंगे तो मिट जाएंगे। नीम की जड़ पानी में घिस कर लगाने से भी लाभ होता है। 

(2) गंधक, लोबान, कपूर और चन्दन सब समान मात्रा में मिला लें। जितनी मात्रा हो उससे दूनी नीम की पत्ती मिलाकर सुखाकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण की धूनी देने से वातावरण शुद्ध होता है और विषैले व संक्रामक कीटाणुओं का सफाया हो जाता है। 

(3) नीम की पत्तियों का रस मसूड़ों पर रोजाना लगाने से मसूड़ों के विकार, सड़न, कमजोरी और पायरिया रोग की शिकायत समाप्त हो जाती है। 

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नींबू के विविध प्रकार के घरेलू उपाय

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lemon

दोस्तों आज में अपने इस आर्टिकल में आपको नींबू के विविध प्रकार के घरेलू उपाय बताउंगी जो की बहुत लाभकारी है। गर्मियों के दिनों में नींबू का सेवन करना बहुत ही अच्छा माना जाता है।नींबू   से अनेक प्रकार के फायदे होते हैऔर नींबू में भारी मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। नींबू एक वरदान है जिसका प्रयोग हम कई प्रकार की बीमारियों व त्वचा से जुडी कई समस्याओं में कर सकते है। यू कहे तो नींबू एक फायदे अनेक तो चलिए जानते है की नींबू का प्रयोग हम किन किन बीमारियों व त्वचा से जुडी समस्याओं में कर सकते है।

(कब्ज़ नाशक)

प्रातः काल गुन गुने पानी में एक नींबू निचोड़ कर पीने के बाद शौच जाएं कुछ दिन तक नियमित यह प्रयोग करने से क़ब्ज़ मिट जाता है और पेट ठीक से साफ होने लगता है।

(डायरिया)

एक गिलास ताजी छाछ में नींबू निचोड़ कर पीने से तुरंत आराम मिलता है और मोशन आना बंद हो जाते है दिन में इसको आप 2 बार पी सकते है। 

(चेहरे की कान्ति)

नींबू काट कर चेहरे पर हल्के हाथो से रगड़ें और आधा घंटे बाद ठंडे जल से धो लें। लगातार इसे प्रयोग करने से चेहरे की त्वचा स्वच्छ और कान्ति पूर्ण हो जाती है।

(बालों के लिए)

बाल झड़ना, पकना और छोटे होना आदि की शिकायत होने पर नींबू के रस में आवंला, शिकाकाई का चूर्ण घोलकर बालों की जड़ो में लगाए और फिर बालों में लगाकर 15-20 मिनट तक हलके हाथों से मसले फिर ठंडे पानी से धो लें। इस प्रयोग से बाल मजबूत, घने व लम्बे होते है और असमय पकते नहीं।

(दांत व मसूड़ों के लिए)

नींबू के छिलको को सुखाकर कंडे की आग में जला लें व बारीक पीस लें। इस चूर्ण में जरा सा नींबू का रस डालकर दांतो व मसूड़ों पर लगाकर मंजन करने से दांत चमकीले और मसूड़े मजबूत होते है तथा खून आना बंद होता है।

(शरीर की त्वचा)

नींबू का रस 100 ग्राम, गुलाब जल 100 ग्राम और ग्लीसरीन 150 ग्राम सबको मिलकर साफ शीशी में भर कर रख लें।और नहाने से पहले चेहरे व सारे शरीर में लगा लें और सूखने के बाद नहाले। थोड़े ही दिनों में त्वचा की खुश्की मिट जाती है और त्वचा रेशम सी चिकनी, मक्खन सी मुलायम और कांच की तरह कान्ति पूर्ण हो जाती है।

(जी मिचलाना)

पित्त प्रकोप होने या भीषण गर्मी होने पर प्रायः जी मिचलाने लगता है। ऐसी दशा में थोड़ी चीनी के साथ नींबू का रस चाटने या नींबू चीनी की शिकंजी पीने से तुरंत लाभ होता है। ग्रीष्म ऋतु में प्रतिदिन भोजन के 1 घंटे बाद नींबू की शिकंजी अवश्य पीना चाहिए।

(अच्छा पाचन)

नींबू के 100 ग्राम रस में आधी मात्रा में सफेद जीरा पिसा हुआ मिला लें और जरा जरा सा काला व सेंधा नमक दाल लें। इसे धूप में 15 दिन तक रखें भोजन के बाद इस मिश्रण को 2 चम्मच मात्रा में मिलाकर पीने से पाचनशक्ति बढ़ती है और खाना हजम हो जाता है। 

(मोटापा कम करें)

प्रतिदिन एक गिलास पानी में नींबू निचोड़ कर उसमें शहद मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है। नींबू मोटापा कम करने में बहुत सहायक होता है। इसका असरआप एक महीनें में देख सकते है लेकिन इस उपाय को प्रतिदिन करेंगे तभी लाभ होगा।
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तुलसी के विविध प्रकार के घरेलू नुस्खे

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Tulsi

दोस्तों में आज अपने इस आर्टिकल में तुलसी, के विविध प्रकार के घरेलू नुस्खे बताने जा रही हूँ जो की बहुत लाभकारी है जिनका उपयोग कर आप घर बैठे, कम खर्च और कम समय में  छोटी मोटी व्याधि से मुक्ति पा सकते है। तुलसी का पौधा बहुत ही गुड़कारी होता है ये तो आप सब जानते ही होंगे जिस प्रकार शरीर धारियों में मनुष्य, वृक्षों में पीपल का वृक्ष, नदियों में पवित्र गंगा नदी और पर्वतों में विशाल हिमालय पर्वत है उसी प्रकार पौधो में तुलसी का पौधा सर्वश्रेष्ठ है। तो चलिए आज जानते है की हम इन नुस्खों को घर पर ही किस प्रकार प्रयोग में लाये और इनका लाभ उठाए।

तुलसी के विविध प्रकार के घरेलू उपाय 

(शिशु कास रोग)          

श्यामा तुलसी का रस 10 बूंद और अजवाइन का महीन चूर्ण समान मात्रा में लेकर चार गुने शहद में मिला लें। यह 1 खुराक हुई। ऐसी 3 खुराक प्रतिदिन देने से बच्चों को खांसी से छुटकारा मिल जाता है।

(दांत निकलते समय)

तुलसी की 50 पत्ती आधे गिलास पानी में डालकर खूब उबालें। अच्छी तरह उबाल कर छान लें। इसे दो खुराक में सुबह शाम बच्चे को पिलाने से दांत सरलता से निकलते हैं।

(दूध फेंकना)

पेट खराब होने पर बच्चे दूध फेंक दिया करते है। तुलसी के पत्तो का रस 1भाग, 2 भाग जवाखार और 4 भाग सांभर नमक मिला क्र सुबह शाम बच्चे को देने से उदर विकार और अजीर्ण ठीक होकर पाचन सुधर जाता है।

(प्रसव पीड़ा)

20 ग्राम गोघृत और 10 ग्राम तुलसी की पत्ती का रस मिलाकर गरम करके प्रसव के समय स्त्री को देने से प्रसव पीड़ा में आराम मिलता है।

(चेहरे की झांई) 

चेहरे पर झांई, धब्बे आदि होने पर तुलसी की पत्ती का रस या पत्तियों को महीन पीस कर चेहरे के धब्बों पर मलना चाहिए। आधे घंटे बाद पानी से धोकर नारियल या चंदन का तेल लगाना चाहिए।

(मच्छरों से बचाव)

शयनकक्ष में 4-5 गमले तुलसी के रखने से मच्छर नहीं आते। तुलसी का रस 100 ग्राम, तुलसी के 10 पत्ते पीसी हुई लुग्दी के रूप में और तिल का तेल 25 ग्राम इन सबको मिलाकर गरम कर लें और छान कर शीशी में भर लें। इससे शरीर पर मालिश करने से मच्छर नहीं काटते है।

(सिर की जूं)

तुलसी की लगभग 50 पत्तियों को आधे लीटर पानी में उबालें। जब चौथाई जल शेष बचे तब उतार कर ठंडा कर लें इस पानी से सिर के बाल धोने से जूं होती नहीं है और जूं हो तो समाप्त हो जाती है।

(ज्वर)

तुलसी का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाना चाहिए, इसके बाद रजाई ओढ़कर कुछ देर सो जाय और पसीना आने के बाद ज्वर (बुखार) उतर जायगा।

(खाँसी)

तुलसी और अडूसा के पत्तो को बराबर मात्रा में घोट लें और इसे पिले इसे दिन में दो बार ही लें। इससे खाँसी में आराम मिलेगा।

(सिर दर्द)

तुलसी की पत्तियों के रस को और कपूर को चन्दन में बराबर मात्रा में पीस लें और खूब गाड़ा करके उसे सिर पर लगाइए। इसे लगाने से सिर का दर्द होना बंद हो जाता है।

(गले के दर्द)

तुलसी की पत्तियों को शहद में मिला लें और इसे थोड़ा थोड़ा कर के दिन में 3-4 बार चाटने से गले के दर्द में आराम मिलता है और गले का दर्द बंद हो जाता है

(जल जाने पर)

तुलसी की पत्तियों का लेप बना लें फिर उसमें नारियल का तेल मिला लें और जहां जला हो उस जगह लगाय इस नुस्खे से जले हुए निशान पर आराम मिलता है।

(आंखो की रोग में) 

तुलसी का लेप बनाकर आंखो के आस -पास रखने से ऑंख ठीक हो जाती है और अगर आप तुलसी के रस में रुई भिगोंकर पलक के ऊपर रखे तो इससे आँखो की रोशनी बढ़ती है।

(बाल झड़ने अथवा सफ़ेद होने पर)

तुलसी की पत्तियों के साथ आँवले को मिलाकर सिर धोने से ना तो बाल झड़ते है और न जल्दी सफेद होते है पर यह नुस्खा नियमित रूप से प्रयोग करने पर ही फायदा होता है।

(फोड़ो पर)

तुलसी की पत्तियों को पतीले में पानी डाल कर गर्म कर लें और ठंडा होने पर उसके पानी को छान लें और इस पानी से फोड़ो को धोइये। इससे दर्द भी बंद होगा और विष भी नष्ट हो जाएगा।

(कान का दर्द)

तुलसी की पत्तियों को पीस कर उसके रस को निकाल लें और रुई में भिगोकर कान पर रखे रहने से कान का दर्द तुरंत बंद हो जाता है।

(दांत का दर्द)

तुलसी और काली मिर्च को बराबर मात्रा में पीस लें और इसकी छोटी छोटी गोलियाँ बना लें। जिस जगह दर्द हो रहा है उस जगह पर 1 गोली को रखें दर्द बंद हो जायगा।

(जी घबड़ाने पर)

थोड़ी सी तुलसी की पत्तियाँ लें और उसमें जरा सी काली मिर्च डालकर पीस ले और इसमें थोड़ा शहद मिलाकर चाटे इससे आपका जी नहीं घबड़ायेगा और चित्त भी प्रसन्न रहेगा ये दिन में दो बार चाट सकते है पर इससे ज्यादा नहीं।

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हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त)

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एसिडिटी

दोस्तों आज कल गलत आहार विहार और स्वाद के कारण हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त)की शिकायत अधिकांश स्त्री पुरुषों में होती जा रही है। नाना प्रकार के चटपटे, तीखे, मिर्च मसाले वाले खट्टे और तले हुए पदार्थो का अधिक सेवन और समय असमय भोजन करने से पाचन प्रक्रिया बिगड़ती है, त्रिदोष कुपित होते है और उदर व्याधियां पैदा होती है। हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) इन व्याधियों में प्रमुख है इस विषय में लापरवाही करने से अन्य व्याधियां भी उठ खड़ी होती है, अतः जितनी जल्दी इस व्याधि से मुक्ति प्राप्त कर ली जाए उतना ही अच्छा है।तो आज में अपने इस आर्टिकल में आपको हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) होने के कारण, लक्षण व घरेलू उपाय बताउंगी। 

हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) के कारण 

हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) होने के प्रमुख कारण इस प्रकार है। पहले किए हुए भोजन के भलीभांति पच जाने से पहले ही भोजन कर लेना, कम मात्रा में भोजन करना या बिलकुल ही भूखे रहना, अधिक मात्रा में और बार बार खाना, भूख के समय भोजन न करना और भूख समाप्त हो जाने पर भोजन करना, बासा और दूषित आहार लेना, अधिक खटाई और मिर्च मसले युक्त खारे, तले पदार्थो का अति सेवन करना, भोजन करके तुरंत सोना, दिन में सोना, वेगों को रोकना और कर्म का अति योग, अयोग व मिथ्या योग करते रहना। उपयुक्त कारणों से जठरागिन दूषित हो जाती है। जठरागिन दूषित होने पर अजीर्ण होता है और अजीर्ण के कारण अपचित आहार नाना प्रकार के दोष उत्तपन्न करता है। इससे अन्न विष की तरह (फ़ूड-पाइजन)होकर जलन, प्यास, अम्लता, अल्सर आदि रोग पैदा करता है।

हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) के लक्षण 

अम्लपित्त होने पर कई लक्षण प्रकट होते है। जैसे भोजन का उचित ढंग से पाचन न होना। बिना परिश्रम किये थकावट होना।जी मिचलाना। कड़वी और खट्टी डकारें आना। शरीर में भारीपन रहना। ह्रदय और कण्ठ में जलन होना। खाने में रूचि न रहना। भूख न लगना। ये सारे लक्षण हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) होने पर होते हे।

हाइपर एसिडिटी (अम्लपित्त) के घरेलू उपाय  

(1) प्रतिदिन आंवले का चूर्ण 10 ग्राम मात्रा में भोजन के साथ लेना चाहिए और जब ताज़े आंवले उपलब्ध रहते है तब आंवले का रस 10 ग्राम मात्रा में भोजन के साथ सेवन करना चाहिए। 

(2) गुलकन्द 10 ग्राम मात्रा में सुबह शाम और दोपहर को जल के साथ लेना चाहिए।

(3) चुना पानी में गलाकर रख दें। 2-3 दिन बाद ऊपर से पानी नितार कर शीशी में भरकर रख लें इस पानी को भोजन के बाद प्रतिदिन एक बार 10 ग्राम मात्रा में पीना चाहिए 

(4) 5 ग्राम मुलहठी का चूर्ण 5 ग्राम देसी घी में मिलाकर 15 ग्राम शहद के साथ प्रतिदिन चाटना चाहिए /

(5) रात को सोने से पहले एक गिलास मीठे दूध के साथ 10 ग्राम देसी घी मिलाकर पीना चाहिए। 
  
इस रोग से छुटकारा पाने के लिए आहार विहार पर नियंत्रण करना बहुत आवश्यक होता है। अपने आहार में घी, मक्खन, चिकने पदार्थ,खिचड़ी, मीठा दलिया, दूध चावल की खीर, छिलके वाली मूंग की दाल, चोकर वाले गेहूँ के आटे की ताजी चपाती (रोटी) हरी साग सब्ज़ी, मीठा अनार, अंगूर और मौसम्बी का सेवन करना चाहिए। भोजन की मात्रा सन्तुलित रख कर उचित समय पर भोजन करना चाहिए। 

जिन कारणों की ऊपर शुरू में चर्चा की गई है उनको सर्वथा त्याग देना चाहिए। तुअर की दाल, तले पदार्थ, लाल मिर्च, खटाई, बेसन, अरबी, खट्टे पदार्थ अचार चटनी आदि चाय, तम्बाकू, मांस, अण्डे, मदिरा, नमकीन खारे पदार्थ, दिन का सोना, भोजन के तुरन्त बाद सोना और भोजन के साथ ज्यादा जल पीना आदि त्याग देना चाहिए। इतना उपाय और इन बातों का नियमित रूप से पालन करने पर एक माह के अन्दर अन्दर लाभ होने लगेगा। जब तक पूर्ण निरोग न हो जाए तब तक बदपरहेजी बिल्कुल न करें। 

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लौकी से बने 3 तरह के व्यंजन

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दोस्तों आज में आपको लौकी से बने 3 तरह के व्यंजन बनाना बताउंगी। लौकी से कई व्यंजन बनाए जा सकते है स्वीटडिश भी बना सकते है जो की बहुत स्वादिष्ट बनती है। तो आप ये लौकी से बने  3 व्यंजन घर पर जरूर बनाए और अपने परिवार के साथ इस व्यंजनों का मजा लें। 

(1) लौकी का हलवा 

सामग्री

1 किलो लौकी 
2 लीटर दूध 
100 ग्राम पिसी चीनी (शक़्कर) या अंदाज से 
100 ग्राम किशमिश 
8-10 इलायची

 बनाने की विधि 

लौकी को छीलकर उसके बीज निकालकर कद्दूकस कर लें अब दूध को कड़ाही में डालकर उबाल लें फिर उसमे किसी हुई लौकी डाल दे और धीमी आँच पर उबलने दे, जब लौकी गल जाए और पूरा मिश्रण गाढ़ा होने लगे तो उसमें पिसी हुई शक़्कर अंदाज से डाल दे, साथ ही किशमिश भी डाल दें अब इसे आँच पर से उतार लें और लीजिए गरमा गर्म हलवा तैयार है।

(2) लौकी की बर्फी 

सामग्री 

1 किलो लौकी 
2 किलो मावा (खोया)
250 ग्राम नारियल का बुरा (पिसा नारियल)
8-10 इलायची
चीनी स्वादानुसार

 बनाने की विधि 

लौकी को किस लें फिर उसमें मावा मिला लें और कड़ाही में डालकर धीमी आँच पर धीरे धीरे भून लें जब भुनने की खुशबु आने लगे तो उसमे नारियल का बुरा डाल दे तथा इलायची पीस कर डाल दें। अब एक अलग कड़ाही में शक़्कर तथा पानी डालकर गर्म करें और जब दो तार की चाशनी बन जाए तो लौकी और मावे का मिश्रण इसमें डालकर अच्छी तरह से मिलाले फिर थाली में थोड़ा सा तेल चारो तरफ लगाकर मिश्रण को थाली पर फैला लें तथा ठंडा होने पर बर्फी के आकार के टुकड़ो में काट लें और लीजिए लौकी की बर्फी तैयार है।

(3) लौकी और चने की दाल की सब्जी 

सामग्री 

250 ग्राम चने की दाल 
500 ग्राम लौकी
थोड़ा सा आमचूर पाउडर 
आधा चम्मच लाल मिर्च पाउडर 
आधा चम्मच हल्दी 
आधा चम्मच धनिया 
आधा चम्मच जीरा 
नमक स्वादानुसार

 बनाने की विधि 

लौकी को छीलकर छोटे छोटे टुकड़े में काट लें अब चने की दाल तथा लौकी को नमक व हल्दी डालकर उबाल लें, जब दोनों चीजे गल जाए तो उन्हे आँच पर से उतार लें। अब कड़ाही में तेल डालकर जीरा डाल दें फिर मिर्च, धनिया, हल्दी डालकर थोड़ा सा पानी डालें और मसलों को भून लें, फिर लौकी तथा चने की दाल इसमें डाल दें थोड़ा सा पानी डालकर उबालें। फिर उतार कर हरा धनिया बारीक काट कर डालें। लीजिए तैयार हो गया लौकी और चने की दाल की सब्जी।

आपने मेरे इस आर्टिकल को पड़ा इसके लिए में आपका हार्दिक धन्यवाद करती हूँ। इसमें दिए गए व्यंजन की विधि को घर पर जरूर बना कर देखें और नीचे दिए गए कमेंट में सूचित करने की कृपा करें। 😊😊

चावल से बने 3 तरह के व्यंजन

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चावल से बने 3 तरह के व्यंजन

दोस्तों आज में आपको चावल से बने 3 तरह के व्यंजन बनाना बताउंगी। चावल से कई व्यंजन बनाए जा सकते है स्वीटडिश भी बना सकते है जो की बहुत स्वादिष्ट बनती है और चावल तो सबको ही अच्छे लगते है तो आप चावल से बने  3 व्यंजन घर पर जरूर बनाए और अपने परिवार के साथ इस व्यंजनों का मजा लें। 

(1) नवरतन पुलाव 

सामग्री 

  • 250 ग्राम चावल
  •  50 ग्राम प्याज
  • 100 ग्राम घी 
  • 25 ग्राम अदरक 
  • 7-8 लौंग 
  • काली मिर्च आधी चम्मच 
  • 6-7 छोटी इलायची 
  • दालचीनी जरा सी 
  • 1 चम्मच जीरा 
  • 100 ग्राम पनीर 
  • 100 ग्राम मटर1 चम्मच खसखस 
  • हरी मिर्च स्वादनुसार 
  • काजू, पिस्ता, किशमिश आवश्यकता अनुसार
  • नमक, हींग स्वादनुसार

नवरतन पुलाव बनाने की विधि 

  1. चावल साफ कर आधा घंटे तक पानी में भिगोएं। 
  2. सूखे मेवे और पनीर के टुकड़े घी में तलकर रख लें।
  3. प्याज अदरक काट कर भून लें।हींग जीरा लौंग काली मिर्च दालचीनी और इलायची भी भून लें व हिला दें। 
  4. थोड़ी देर बाद इनमें चावल और थोड़ा पानी डालकर एक चम्मच खाने का रंग पानी में घोल कर डाल दें और पकने के लिए गैस पर चढ़ा दें। 
  5. जब चावल पकने के करीब हो तब पनीर के टुकड़े डाल कर पतीले को गैस पर रख कर धीमे धीमे पकने दें। 
  6. पानी जब सूख जाये तब नीचे उतार कर तले हुए मेवे और भुने हुए प्याज अदरक छिड़क कर मिला दें। 
  7. लीजिए नवरतन पुलाव तैयार है।इसे गरमा गर्म दही या हरी चटनी का साथ सर्व करें। 

(2) वेजिटेबल पुलाव

 सामग्री 

  •  200 ग्राम बासमती चावल 
  • 200 ग्राम आलू 
  • 100 मटर 
  • 50 ग्राम प्याज के लच्छे 
  • 25 ग्राम अदरक के लच्छे 
  • 100 ग्राम घी 
  • 6-7 लौंग व इलायची 
  • 1 चम्मच जीरा 
  • 4-5 तेजपत्ता
  • काजू किशमिश इच्छानुसार जरासी दालचीनी 
  • हरी मिर्च व नमक स्वादनुसार

वेजिटेबल पुलाव बनाने की विधि 

  1. चावल साफ करके भिगो दें। प्याज अदरक के लच्छे घी में तल लें और फिर काजू किशमिश तल कर निकाल लें। 
  2. बचे हुए घी में तेजपत्ता जीरा दालचीनी हरी मिर्च आलू के टुकड़े और मटर भून लें। 
  3. चावल पानी से निकाल कर पतीली में डालें और थोड़ा पानी डाल कर रख दें।
  4. चावल तली से न लगें इसके लिए गैस धीमी रखें। 
  5. चावल पक जाने पर उल्टी कड़छी से चलाते हुए प्याज अदरक के लच्छे और काजू किशमिश डाल कर मिला लें। लीजिए पुलाव तैयार हैं।

(3) चावल के गुलाबजामुन 

सामग्री 

  • 1 कप पके चावल 
  • 2 चम्मच अरारोट 
  • 2 कप चीनी 
  • 5 छोटी इलायची का दाना 
  • जरा सा गुलाबजल
  • थोड़े सी किशमिश 
  • घी तलने के लिए

चावल के गुलाबजामुन बनाने की विधि

  1. पके चावल पीस कर अरारोट मिला लें और पीस या घोट कर अच्छी तरह एक सार कर लें। 
  2. इस मिश्रण के रसगुल्ले के आकार के गोले बना बना कर अन्दर 1-1 किशमिश व जरा सी इलायची का दाना रख दें और धीमी आँच पर घी में तल लें। 
  3. चीनी की चासनी पहले से बना कर रखें और इन रसगुल्लों को तल कर चाशनी में डालती जाये इन्हें ठंडा होने के बाद चाशनी के साथ परोसें। 
  4. ऊपर से गुलाबजल की कुछ बुँदे छिड़क दें लीजिए चावल के गुलाब जामुन तैयार हैं।
आपने मेरे इस आर्टिकल को पड़ा इसके लिए में आपका हार्दिक धन्यवाद करती हूँ। इसमें दिए गए व्यंजन की विधि को घर पर जरूर बना कर देखें और नीचे दिए गए कमेंट में सूचित करने की कृपा करें। 😊😊

पनीर से बने 3 तरह के व्यंजन

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Cheese

दोस्तों आज में अपने इस आर्टिकल में आपको पनीर से बने 3 तरह के व्यंजन बनाना बताउंगी। पनीर से बने व्यंजन स्वादिष्ट तो होते ही है और पौष्टिक भी होते है। पनीर में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। पनीर ज्यादातर सभी लोगों को पसंद होता है। 

(1) पनीर पराठा

सामग्री 

200 ग्राम पनीर किसा हुआ 
आटा आवश्यकता अनुसार 
अजवायन आवश्यकता अनुसार 
नमक आवश्यकता अनुसार 
लाल मिर्च आवश्यकता अनुसार 
हरी मिर्च आवश्यकता अनुसार 
हरा धनिया आवश्यकता अनुसार

विधि 

किसे हुए पनीर में सब मसालें मिला कर स्टाफिंग तैयार कर लें। पराठे का आटा गूंध लें व लोई बनाकर पराठे बेलें व बीच में पनीर की स्टाफिंग भरे। पराठे को रोल कर हाथ से चपटाकर लम्बाई पर घी लगाकर फिर पुनः लोई करके सूखे आटे का पलथन लगा कर बेलें व तवे पर पराठे की तरह घी लगा कर सेकें। ये पराठे चाय नाश्ते के टाइम परोसें।

(2) पनीर कोरमा 

सामग्री 

1 कप पनीर किसा हुआ 
2 टमाटर बारीक़ कटे हुए 
2 हरी मिर्च लम्बी कटी हुई 
हरा धनिया स्वादनुसार 
नमक, मिर्च स्वादनुसार 
हल्दी, गर्ममसाला स्वादनुसार
थोड़ी काजू, किशमिश 
अदरक किसा हुआ
आधा कप उबले मटर 
जरा सी हींग व घी

विधि  

घी गर्म करें व हींग डाल कर काजू किशमिश भूनें और टमाटर, सभी मसलें व अदरक डाल क्र तब तक पकाए कि मसाला घी छोड़ दें। हलके हाथ से किसा हुआ पनीर व मटर के दाने मिला कर 2 मिनट तक पकाए फिर उतार लें व हरा धनिया काट कर डाल दें।गरमा गर्म पनीर कोरमा तैयार है।

(3) पनीर के कटलेट

सामग्री 

1 कप पनीर 
2 हरी मिर्च
2 ब्रेड के पीस 
1 बड़ा चम्मच भुना हुआ मैदा 
1/2 चम्मच आमचूर 
2 बड़े चम्मच सादा मैदा 
घी तलने के लिए 
ब्रेड का चुरा (ब्रेड क्रम्स)
1/2 अदरक 
1 बड़ा प्याज 
नमक स्वादनुसार 
लाल मिर्च स्वादनुसार

विधि 

पनीर को भूनें मैदे ब्रेड के टुकड़ो को (किनारे काट लें व पानी में भिगोकर निचोड़ लें और) मिलाकर अच्छी तरह मसल लें। इसमें बारीक़ कटी हुई अदरक, हरी मिर्च, प्याज, नमक, मिर्च, आमचूर आदि मिला लें। सादी मैदा पानी में घोल लें और घी डाल कर कड़ाही आग पर चढ़ा दें। पनीर के मिश्रण के कटलेट बनाकर पहले घोल में भिगोएं फिर ब्रेड का चुरा लगाकर घी में तले और तैयार है गरमा गर्म पनीर के कटलेट। अब इसे चाय के साथ नाश्ते के रूप में चटनी के साथ गरमा गर्म परोसें।

आपने मेरे इस आर्टिकल को पड़ा इसके लिए में आपका हार्दिक धन्यवाद करती हूँ। इसमें दिए गए व्यंजन की विधि को घर पर जरूर बना कर देखें और नीचे दिए गए कमेंट में सूचित करने की कृपा करें। 😊😊

संस्कार

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Hello दोस्तों आज में अपने इस आर्टिकल में बच्चो को दें अच्छे संस्कार के बारे में चर्चा करुंगी जो हमें अपने माता पिता से मिलते है।

बच्चे कच्ची मिट्टी के सामान होते है जिस तरह कच्ची मिट्टी को कुम्हार बर्तन बनाने के लिए जिस आकार में ढालता है और उस आकार का बर्तन बनने के बाद जब सूख कर तैयार हो जाता है। 

तब उसे तोड़ कर भी हम दुबारा कोई और आकार में नहीं ढाल सकते उसी तरह हम बच्चो को भी बचपन से ही जो सिखाते हे और जो संस्कार देते है वो बड़े होने के बाद नहीं बदल सकते।

 संस्कार क्या हैं?

संस्कार के विषय में चर्चा शुरू करने से पहले इसकी परिभाषा प्रस्तुत कर देना जरुरी है ताकि विषय को हम पर्याप्त गहराई तक समझ सके और लाभ उठा सकें।

किसी पदार्थ का संस्कार करने का मतलब है इसके मौलिक गुण, रूप और उपयोगिता में परिवर्तन और नवीनता उत्पन्न करना। किसी द्रव्य में गुणों का अन्तर करना या स्थापना करना 'संस्कार करना' है।

 उदाहरण 

उदाहरण के लिए किसी पदार्थ को संस्कारित करने के लिए आधार, समर्क, संयोग, मिश्रण आदि जरुरी होता है। इन विधियो से किसी पदार्थ को संस्कारित करने से इसके मूल गुणों में परिवर्तन हो जाता है, वृद्धि हो जाती है नये गुण पैदा हो जाते है।

जैसे गेहूँ के आटे में जो गुण होते है वे गुण आटे को संस्कारित करने पर ज्यों के त्यों नहीं रह पाते। वे घट जाते है, बढ़ जाते है, बदल जाते है और नये गुण पैदा भी हो जाते है।

आधार, सम्पर्क, संयोग और मिश्रण आदि करके गेहूँ के आटे से रोटी, पराठे, पूरी, हलुआ, दलिया तथा विविध प्रकार के अन्य व्यंजन बनाए जाते है और सभी व्यंजनो के गुण और प्रभाव अलग अलग होते है।

आग, तेल,मसालें एवं अन्य पदार्थो से आटे को संस्कारित करने से ऐसा होता है। ये पदार्थ किसी के लिए अनुकूल साबित होते है तो किसी के लिए प्रतिकूल।पदार्थ को बनाना, सेंकना, भूनना, तलना ही 'संस्कार करना है।'

पदार्थ के मिश्रण, संयोग व प्रयोग आदि के संस्कारो का इतना विवरण पढ़कर आप संस्कारो के महत्व और उपयोग को समझ चुके होंगे।

अब हम इस विषय पर जीवात्मा के संस्कारो की चर्चा करते है। जैसे प्रत्येक पदार्थ अपने मौलिक गुण पृथक रूप से रखता है और विभिन्न प्रकार के संस्कार किए जाने पर विभिन्न प्रकार के अच्छे या बुरे गुण धारण कर लेता है। 

उसी प्रकार जीव भी अपने मौलिक गुणों के बावजूद नाना प्रकार के संस्कारो से संस्कृत होकर नाना प्रकार के गुणों और परिणामों को उपलब्ध होता है।

 संस्कार क्यों देने चाहिए?

जैसे हमारे संस्कार होते है (जो की हमारे शुभाशुभ कर्मो से बनते है) वैसे ही अच्छे बुरे गुण और मनोवृति हम उपलब्ध करते रहते है।

हमारा आज जैसा भी जीवन है और कल जैसा भी जीवन होगा वह हमारे ही कर्मो से बनने वाले संस्कारो का परिणाम होगा इस सिद्धांत का बहुत सूष्म और गहरा प्रभाव हम पर पड़ता है

जैसे अच्छी और भारी मात्रा में फसल प्राप्त हो इसके लिए चार अच्छी चीजों का होना जरुरी होता है (1) अनुकूल ऋतु (2) अच्छी जमीन यानि खेत (3) अच्छा जल और (4) अच्छा बीज इनमे से कोई एक भी चीज के न होने पर कोई फसल पैदा नहीं हो सकती, कोई नया अंकुर पैदा नहीं हो सकता। 

इसी के साथ अच्छी और गुणवत्ता युक्त फसल के लिये चारो चीजों का अच्छी श्रेणी का और पर्याप्त मात्रा में होना भी जरुरी है वरना न तो फसल पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होगी और न अच्छी क़्वालिटी की होगी।

बिल्कुल इसी प्रकार आयुर्वेद ने अच्छी संतान प्राप्त करनेके लिये भी इन्ही चारो चीजों का अच्छी और आवश्यक मात्रा में तथा गुणवत्ता युक्त क़्वालिटी का होना जरुरी माना है।

जैसे अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए अच्छा बीज बोना जरुरी है उसी तरह पुरुष के शुक्र का शुद्ध, निर्दोष और पुष्ट होना जरुरी है। 

जैसे खेत की जमींन का उपजाऊ होना जरुरी है उसी प्रकार स्त्री का गर्भाशय शुद्ध, विकार व दोष रहित और बलवान होना बहुत जरुरी है। 

जैसे अच्छी फसल उत्त्पन्न होने के साथ यह भी जरुरी है कि उसकी देखभाल और सुरक्षा भी की जाए। इसी प्रकार संतान को गर्भ में पोषण करने के समय वैचारिक रूप से भी अच्छे विचार और अच्छे अचार द्वारा गर्भस्थ जीव को अच्छे संस्कार प्रदान करना होगा।

जैसे उचित तरीको से अच्छी खेती करने वाला अच्छी फसल कर पाता है उसी प्रकार अच्छे विचार और संस्कारो के द्वारा जो संतान उत्पन्न की जाती है वही संतान उत्पन्न करने वाले माता-पिता को सुख और यश देती है।

माता-पिता गर्भस्थ जीव (शिशु) का कैसे रखें ख्याल?

अतः सभी माता-पिताओं को पूरा ध्यान रखकर यथोचित प्रयतन करना चाहिए। उन्हें गर्भाधान के पूर्व से ही मानसिक तैयारी करके अपने आचार-विचार अच्छे रखकर ही गर्भाधान करना चाहिए। 

पूरे गर्भकाल में भी खास तौर से माता को, अपने आचार-विचार शुद्ध, उत्तम और विधिवत ढंग से रखना चाहिए ताकि गर्भस्थ जीव पर अच्छे संस्कार पड़े।

जन्म के बाद शिशु जब तक पूरा बोध प्राप्त न कर ले तब तक भी माता-पिता को सावधान रहकर उसे अच्छे संस्कार देते रहना चाहिए। क्योकि बाल्यकाल के संस्कार पुरे भावी जीवन को प्रभावित करने वाले सिद्ध होते है।

आज के वातावरण का प्रभाव हम छोटे बच्चों पर स्पष्ट रूप से देख सकते है। बच्चों के हावभाव, स्वभाव आचरण बोलचाल और आदतों पर वर्तमान वातावरण की छाप साफ-साफ दिखाई देती है। 

आप इसे देखकर ही यह अंदाजा लगा सकते है कि इस बच्चे के माँ-बाप कैसे होंगे ! फूल या फल को देखकर ही आप समझ जाते है है कि यह किस पेड़ का फूल या फल है। 

आज जैसी संताने हो रही है उसके मूल कारण में माता-पिता के आचार विचार और आहार का दायित्व ही विधमान है।

जैसे खेती के लिए एक कहावत है --- खेती आप सेती यानि खेती तभी अच्छी और भरपूर मात्रा में होती है जब किसान खुद ही उसकी देखभाल और सम्हाल करता है। 

इसी तरह संतान को पैदा करने और ठीक से पालन-पोषण कर उन्हें अच्छे संस्कार देने का कार्य भी माता-पिता को ही करना होगा। दुसरो के भरोसें रहना ठीक नहीं।

आपने इस आर्टिकल को पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद करते है | कृपया अपनी राये नीचे कमेंट सेक्शन में सूचित करने की कृपा करें | 😊😊

बच्चों को ना कहना सीखिए (परवरिश)

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say no

Hello दोस्तों आज मै अपने इस आर्टिकल में आपसे बच्चों को ना कहना सीखिए के बारे में अपनी राय शेयर करुंगी। 

मेरा मानना है कि जब बच्चे अभिभावकों के साथ किसी भी बात पर अपनी सहमति या असहमति व्यक्त करते है तो वे खुद को सही ठहराना और समझौता करना सीखते है। 

इसलिए जरुरी है कि आप जब भी उन्हे ना कहे तो सकरात्मक और सही ढंग से कहें इसमें में आपकी मदद करना चाहूंगी। 

हम सभी अपने बच्चो को लेकर काफी भावुक होते है। हम सभी अपने बच्चो को सम्मानित और सम्पन जीवन देना चाहते है। 

परन्तु जब भी हम अपने बच्चों को जिंदगी में अनुशासन सिखाना चाहते है, तो हमें उनको 'ना' चाहते हुए भी कई चीजों के लिए ना कहना पड़ता है।

लेकिन अगर हम उनकी हर मांग को पूरा करते हैं या उन्हें किसी भी चीज़ के लिए गलत ढंग से मना करते हैं तो इससे उनका व्यवहार प्रभावित होता हैं।

बच्चे को बार-बार ना कहना भले ही अच्छा ना लगे परन्तु बच्चे के समुचित विकास के लिए यह अति आवशयक है। आजकल के बच्चे बहुत समझदार है। 

उनको सीधे ना बोलना ठीक नहीं है परन्तु ज्यादातर लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते की बच्चों को कैसे मना करें और इसी कारण बच्चे ज़िद, गुस्सा, निराशा, लापरवाही, मनमोजीपना जैसी भावनाओं से घिर जाते हैं। 

अगर बच्चों को मना करते समय अभिभावक थोड़ी सी सावधानी रखें, तो बड़ी ही आसानी से बच्चों का सही ढंग से विकास किया जा सकता हैं।

बच्चों को सकरात्मक तरीक़े से कैसे बोलें 'ना' 

बच्चों को अगर किसी बात के लिए मना करना है तो उन्हें डांटते हुए कभी भी 'ना' न कहें बल्कि उन्हें प्यार से समझाते हुए किसी भी बात के लिए मना करें और बच्चे का विशवास हासिल करें। 

अगर हम बच्चों को गुस्से से बोलते है तो वो भी यही गुण सीखते है पैरेंट्स अगर विचलित होकर 'ना' बोलते है तो बच्चे को लगता है। 

कि वो अच्छा बच्चा नहीं अपनी वॉइस टोन से लेकर अपने हावभाव को शांत रखें, ताकि बच्चे को आपका 'ना' कहना, अपना तिरस्कार ना लगें।

धैर्य रखें जब आप बच्चों को बोलें 'ना'

अक्सर बहुत से पेरेंट्स बच्चों से किसी भी चीज़ के लिए मना करने के बाद उनसे तुरंत ही स्वीकारने या सामान्य व्यवहार की उम्मींद करने लगते है।

कई बार ऐसा होता है की पेरेंट्स को बार बार वह बात बच्चों को दोबारा समझानी पड़ती है, धीरे धीरे बच्चे आपकी बात समझने लगेंगे। 

लेकिन आपके कह देने से उनका मन बदल जाएगा ऐसी काल्पनिक उम्मीद न रखें।आपको थोड़ा धैर्यपूर्ण रहना होगा। 

बच्चों के साथ मारपीट करने से पूरी तरह बचें 

कई बार ऐसा होता हैं, कि पेरेंट्स बहुत जल्द बच्चों पर हाथ उठाने लगते हैं और जिसकी वजह से आगे चलकर बच्चे उनके साथ गलत व्यवहार करने लगते हैं। 

इसलिए मारपीट आपका आखिरी हथियार होना चाहिए इसे मामूली बातो पर खर्च ना करें , जब बच्चा बहुत बड़ी गलती कर दें तो कभी एक थप्पड़ मार दें। 

लेकिन बच्चों पर हर बात पर हाथ उठाना बहुत ही गलत होता है। 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चें तो हर बात को दिल से लगा लेते है, उनमे यह समझ विकसित नहीं हुई होती है। 

कि उन्हे किस बात को किस तरह से लेना चाहिए। जब उनकी पिटाई होती है , तो उन्हे लगता है कि माँ उन्हे प्यार नहीं करती।

इससे बच्चे निराशा और अकेलेपन का शिकार होते है। जो बच्चें अक्सर मार खाते हैं,वे बच्चें स्कूल में जाकर अपने सहपाठियों के साथ मारपीट करते हैं। क्योंकि उन्हे मारपीट करना बहुत सामान्य लगने लगता हैं।

बच्चों का ध्यान भटकाएं 

कई बार किसी चीज़ के लिए मना करने पर बच्चे ज़िद पकड़ लेते हैं, ऐसे में पेरेंट्स को पूरी सतर्कता बरतते हुए बिना बच्चों को डाटे उनका ध्यान किसी और चीज़ की ओर ले जाएं। 

आपको उनका ध्यान वहां से हटाकर दूसरी किसी रोचक बात की तरफमदना चाहिए, यह बच्चों को मना करने का सबसे अच्छा तरीका हैं। 

वे अपनी ज़िद को जल्द ही भूल भी जाते है और उन्हे आप पर गुस्सा भी नहीं आता हैं।

घर में एक दूसरे की बात न काटें 

घर में एक दूसरे की बात कम ही काटें और ऊंची आवाज़ में कतई बात न करें।क्योंकि बच्चा सबसे ज्यादा अपने परिवार से सीखता हैं।

अगर घर पर किसी सदस्य ने बच्चों को टीवी देखने से मना किया हो, तो किसी दूसरे सदस्य को उन्हें टीवी देखने देने की सिफारिश नहीं करनी चाहिए।

किसी बात के लिए आज 'ना' कहकर कल 'हां' न करें। ऐसा करने से बच्चों के मन में बातों के प्रति गंभीरता नहीं रहती। 
जब हम एकजुट होकर बच्चों को कोई बात मना करते हैं तो उन्हें समझ में आता है कि यह बात ठीक नहीं है, इसलिए वह अपनी ज़िद छोड़ देते हैं।

लेकिन अगर दूसरा सदस्य पहले की बात के विपरीत कहे तो बच्चे समझ नहीं पाते कि कौन सही है, वे जो कर रहे हैं, वहीं ठीक हैं।

पेरेंट्स खुद को भी रखें अनुशासित 

 बच्चों को शुरुआत से ही अनुशासन का पालन करना सिखाए। पेरेंट्स बच्चों को प्यार से उन्हे समझाएं, कि जल्द सोना सेहत के लिए अच्छा होता है। 

ज्यादा चॉकलेट खाने से दांत सड़ जाएंगे। हर बात, जो ठीक नहीं है, के लिए बच्चे को समझाते हुए प्यार से 'ना' कहें। इस बात का ध्यान रखें। 

कि जिस बात के लिए आप बच्चे को मना कर रहे हैं, वह अपने पर भी पूरी तरह से लागू करें। बच्चे को जल्द सोने को कहकर आप देर रात तक टीवी देखेंगे तो उसपर बुरा असर होगा।

आपको भी एक अनुशासित जीवनशैली का पालन करना होगा, क्योंकि आप ही उसके रोल मॉडल हैं। 

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जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय जवानी (किशोरावस्था)

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जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय जवानी (किशोरावस्था)

Hello दोस्तों आज मैं आपसे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय जवानी (किशोरावस्था) के बारे में अपना नजरिया शेयर करुंगी। 

ये वो समय है जब हम अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेते है जिनपे की हमारा आगे का पूरा जीवन निर्भर करता है, जैसे कौन सी प्रोफेशनल स्टडी करें,आगे जॉब करें या व्यवसाय करे और शादी कब करें इत्यादि।

निर्णय लेने के लिए हमें अपने आपको जानना जरुरी होता हैं की हम अपने आप से क्या चाहते है और हमें क्या चीज़ करने में ख़ुशी मिलती है

क्योंकि हो सकता है या कह लीजिये की होता ही है की हमारे माता पिता अपनी भावुक्ता के अनुसार हमें कुछ और बताएं करने के लिए और हमारे रिश्तेदार या समाज हमें कुछ और बताएं करने के लिए।

क्योंकि ये जरुरी नहीं होता है कि हमारी उन चीज़ो में रूचि हो या हम उन चीज़ो के प्रति एम्बिशस हों। मैं आपसे यह नहीं कह रही कि आप अपने माता पिता या रिश्तेदार या समाज के खिलाफ जाएँ। 

बल्कि आप अपने जीवन में क्या करना चाहते है आप के क्या सपने है उन्हें पुरे आत्मविश्वास के साथ अपने माता पिता को बताएं ताकि वह आपकी बात को समझें और आपके निर्णय में आपका सहयोग कर पाएं।

किशोरावस्था

बचपन से हम किशोरावस्था से होते हुए युवावस्था में प्रवेश करते है तब हमारा शरीर ही नहीं मन भी बलवान, उमंगो से भरा हुआ सपनों की दुनियां में खोया हुआ हो जाता है।

बचपन के पास भविष्य होता है, बुढ़ापे के पास भूतकाल होता है और जवानी के पास सिर्फ वर्तमान होता है। न भूतो न भविष्यति।

जवानी सिर्फ वर्तमान में जीना चाहती है आगा पीछा सोचना नहीं चाहती। उसकी मान्यता होती है कि जवानी चार दिन की है।

चार दिन की चांदनी और फिर अन्धेरी रात। इसलिए युवा जल्दी जल्दी सब कुछ भोग लेना चाहता है जी भरकर भोग लेना चाहता है .

इसलिए प्रायः युवा अति करने लगता हैं। उनका स्वभाव अतिरेक वादी हो जाता है और यह अति उन्हें अनेक दुख और झंझ्टों में फसा देती है।

एक बार हम जो आदत डाल लें वह धीरे-धीरे हमारा स्वभाव बन जाती है और उसमें पक्के होते जाते है और हमें मालूम ही नहीं हो पाता कि हम कितने बदलते जा रहे है।

बुरा भी चूंकी हमारा हो जाता है तो हमें अच्छा लगने लगता है और हम यह मानने को तैयार नहीं होते कि यह बुरा है। 

जवानी एक जोश का नाम है एक तेज़ बहाव का नाम है रवानी का नाम है। यह जोश जब जरुरत से ज्यादा बढ़ जाता है तो होश खो जाता है .

इसलिए जवानी में जोश तो होता है होश नहीं होता। जवानी मदहोश बना देती है। और मदहोशी की हालत में जो काम होंगे वें ठीक नहीं होंगे।

जोश के साथ होश का होना बहुत जरुरी है। बचपन एक जिज्ञासा है, बुढ़ापा एक अनुभव है तो जवानी एक पुरुषार्थ है, पराक्रम है। 

एक अदम्य शक्ति है और जिसने इसका होश पूर्वक सदुपयोग किया उसी का जीवन सफल हो गया। हमें इस शक्ति का उचित उपयोग, सिमित उपयोग और हितकारी उपयोग करना चाहिए। 

वरना बाद में पछताना ही हाथ रह जाता है। हमारी शक्ति, हमारी ऊर्जा जब श्रेय मार्ग पर, ऊपर की तरफ, विकास की ओर बढ़ती है उठती है। 

तब यह 'राम' बन जाती है यही जब प्रेय मार्ग पर निचे की तरफ बहती है तो काम बन जाती है। युवावस्था में सही होश रखकर राम और काम में उचित सामन्जस्य रखकर अति किये बिना युवा शक्ति का सदुपयोग करना ही दूरदर्शिता व बुद्धिमानी होगी।

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जीवन का सबसे सुन्दर समय बचपन

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बचपन

Helloदोस्तों आज मैं इस आर्टिकल में आपसे जीवन के सबसे सुन्दर समय बचपन के बारे में अपना अनुभव शेयर करना चाहूंगी।उम्मीद है आपको पसंद आएगा।

सुन्दर बचपन

हमारा बचपन इस दुनिया के सतयुग के समान होता है। जब दुनिया अपनी बाल्यावस्था में थी तब सतयुग था। सतयुग याने सत्यताओं से भरा और झूठ कपट से रहित युग।

हम जब पैदा होते है तो कोरी स्लेट की तरह अबोध, निर्दोष और भोले होते है।तब न हम अच्छे होते है न बुरे होते है, निर्विकल्प होते है,च्वाइस लेस होते है।

बच्चा माँ का दूध पीकर मस्त हो जाता है हाथ पैर चलता है और किलकारियां भरता है। यह स्थिति आनन्द की है। वहां न सुख है न दुख है।

यह स्थिति परमहंस होने पर होती है निर्विकल्प होने पर होती है हर बात से राजी रहने पर होती है, एक शिशु की तरह।

फिर जैसे जैसे हम बड़े होते है दुसरो के सम्पर्क में आते है हमें दुनिया की हवा लगती है वैसे वैसे हमारा भोलापन खोने लगता है। 

हमारी निर्दोष स्थिति, हमारी आनन्दमय स्थिति बदलने लगती है हम सुख दुख का अनुभव करने लगते है और चुनाव करने लगते है।इच्छाए करने लगते है और धीरे धीरे चालाक होने लगते है।

हमारे अनुभव हमे चालाक और बेईमान बनाते जाते है। हम निर्दोष और भोले स्वभाव को छोड़कर ज्यादा चतुर और समझदार होते जाते है। 

लेकिन इससे वास्तव में हमें कुछ मिलता नहीं। मिलता होता तो बच्चे दुखी होते और बड़े सुखी होते।दुनियां भर की चालाकियाँ करके भी हम सुखी कहां हो पाते है। 

उल्टा होता यह है की हम जितने बचपन से दूर और बुढ़ापे के निकट होते जाते है उतने ही दुखी होते जाते हैं। इसलिए बूढ़े ज्यादा दुखी होते हैं।

हमारी समझदारी एक चालाकी बनकर रह जाती हैं लेकिन हम समझे भले ही,पर इस चालाकी से मिलता क्या हैं ? हमारा क्या भला होता हैं ?  

एक मजदूर का कारखाने में काम करते हुए बांया हाथ कट गया। महीने भर अस्पताल में रहा। लोग उससे मिलने आये तो एक मित्र बोला "ईशवर को धन्यवाद करो की तुम्हारा दाहिना हाथ नहीं कटा वरना बेकार हो जाते।

अभी काम तो चला ही सकोगे।"वह मजदूर बोला "धन्यवाद देने की कोई जरुरत नहीं यह चतुराई तो मेरी ही है। हाथ तो मेरा दाहिना ही मशीन में गया था। 

यह तो मेरी सूझबूझ और चालाकी रही कि मैने दाहिना हाथ बचाने के तत्काल बाहर खींचकर बांया अन्दर कर दिया था। "

हमारी सारी समझदारी सिर्फ इतनी ही है कि हम यह नहीं समझ पाते कि वास्तव में हम हमारा नुकसान ही कर रहे हैं। 

आपने इस आर्टिकल को पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद करते है | कृपया अपनी राये नीचे कमेंट सेक्शन में सूचित करने की कृपा करें | 😊😊

9 होम फेस पैक (उबटन) विधि

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Face pack.

सौन्दर्य की देखभाल और शृंगार में रूचि रखना नारी का स्वभाव है। आजकल अधिकांश महिलायें आधुनिक सौन्दर्य प्रसाधनो को उपयोग में लेती है जो महगें भी होते है और ये त्वचा के लिए उतने लाभदायक भी नहीं होते लेकिन अगर हम इन महगें प्रसाधनो के स्थान पर प्राकृतिक ढंग से, प्राकृतिक साधनों का उपयोग करें तो हमें ज्यादा लाभ होगा और हमारी त्वचा भी स्वस्थ और सुन्दर रहेंगी। किशोर अवस्था में जब लड़कियों का शरीर विकसित हो रहा होता है, यौवन का आरम्भ हो रहा होता है तब ऐसे समय में ही उन्हें प्राक्रतिक ढंग से अपने सौन्दर्य की देखभाल करनी चाहिए। आज में अपने इस आर्टिकल में आपको 9 होम फेस पैक (उबटन) बनाने की कुछ लाभप्रद घरेलू विधिया बताने जा रहीं हूँ जो की इस प्रकार हैं।

बेसन फेस पैक (उबटन) बनाने की विधि 

यह बहुत प्रचलित और सुपरिचित उबटन है। 2 बड़ा चम्मच बेसन, 1 चम्मच सरसों का तेल और जरा सा दूध। बेसन में दूध और तेल डालकर मिक्स कर लें और इस उबटन को शरीर पर लगा कर थोड़ा सूखने दे फिर हाथों से मसलें। यह उबटन मैल के साथ बत्तियों के रूप में छूट जाएगा। 

जौ फेस पैक (उबटन) बनाने की विधि   

2 बड़े चम्मच जौ का आटा, 1 चम्मच गिल्सरीन, आधा चम्मच तेल और थोड़ा गुलाब जल डालकर मिक्स कर लें और इस उबटन को फेस पर लगाए और सूखने दें फिर हाथों से मसलें। यह उबटन भी मैल के साथ बत्तियों के रूप में छूट जाएगा।

मैदा फेस पैक (उबटन)

2  बड़े चम्मच मैदा आधा चम्मच तेल और थोड़ी सी मलाई मिलाकर उबटन बना लें और फेस या शरीर पर लगा लें और थोड़ा सूखने के बाद बत्तियां बनाकर छुड़ा दें। 

चन्दन फेस पैक (उबटन) बनाने की विधि  

2 बड़े चम्मच चन्दन पाउडर, 1 चम्मच चन्दन का तेल, 1 चम्मच गिल्सरीन कुछ बूंदे नींबू का रस और आधा चम्मच बेसन मिलाकर उबटन तैयार कर लें इस उबटन को गर्मियों के मौसम में लगाना चाहिए।

उड़द फेस पैक (उबटन)

2 बड़े चम्मच उड़द की दाल पीसी हुई, 1 चम्मच कच्चा दूध, 1 चम्मच तेल व कुछ बूंदे गुलाबजल इन सबको मिलाकर उबटन तैयार कर लें और फेस पर लगा लें और सूखने के बाद ठन्डे पानी से मुँह धो लें। 

हल्दी फेस पैक (उबटन)

2 छोटे चम्मच पीसी हल्दी, 1 चम्मच गिल्सरीन, आधा चम्मच तेल, 1 चम्मच कच्चा दूध कुछ बूंद नींबू का रस मिलाकर उबटन तैयार कर लें और फेस पर लगा लें और सूखने के बाद ठंडे पानी से मुँह धो लें।

गुलाब फेस पैक (उबटन) 

थोड़ी सी गुलाब की पखुड़ियां पीस कर 2 चम्मच गुलाब जल, आधा चम्मच ग्लिसरीन, आधा चम्मच मैदा व आधा चम्मच दूध के साथ उबटन तैयार कर लें और फेस पर लगा लें और सूखने के बाद ठंडे पानी से मुँह धो लें।

सौफ फेस पैक (उबटन)

2 बड़े चम्मच पीसी बारीक सौफ आधा चम्मच चावल का आटा, आधी चम्मच तेल और जरा सा कच्चा दूध मिलाकर उबटन तैयार कर लें और शरीर पर लगा लें और थोड़ा सूखने के बाद बत्तियां बनाकर उतार दे।

फेस पैक (उबटन) के लाभ 

उबटन की तरह ऊपर बताये गये किसी भी मन पसंद उबटन को तैयार कर शरीर पर लगा कर पहले अंगुलियों से त्वचा पर फैलाए। थोड़ा सूखने लगे तो हथेलियों से मसल कर छुड़ाए। यह नहाने से पहले करना अधिक अच्छा रहता है। या फिर रात को सोते समय भी कर सकती है। इससे त्वचा मैल रहित, रेशम सी चिकनी, मक्खन सी मुलायम, चमकदार व निरोग होती है। इसे 1 दिन छोड़कर प्रयोग करना काफी है। पर सप्ताह में 1 बार तो जरूर प्रयोग करना चाहिए। उबटन लगाकर नहाने से धीरे धीरे रंग में निखार आता है। 

आपने इस आर्टिकल को देखा इसके लिए आपका धन्यवाद करते है | इसमें दिए गए फेस पैक (उबटन) को प्रयोग कर परिणाम नीचे कमेंट में सूचित करने की कृपा करें | 😊😊

गिट्स का बादाम पिस्ता फलूदा

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दोस्तों आपने गिट्स कम्पनी की कई चीज़े ट्राई करी होंगी उनमें से ही एक है गिट्स का बादाम पिस्ता फलूदा ये एक स्वीट डिश है जो की कुछ मिनटों में बन जाती है और इसको बनाना बहुत ही आसान है। तो आज हम जानेंगे इसको बनाने की विधि जो की में घर पर ट्राई कर चुकी।

समय 

15-20 मिनट 

सर्विंग 

5 मीडियम ग्लास 

गिट्स का बादाम पिस्ता बनाने की विधि

(1)  एक बर्तन में 1200 मिली दूध और 200 मिली पानी मिलाए और मध्यम आँच पर इसे गुनगुना होने तक गर्म करें। 

(2)  पैक की सामग्री को दूध में डालकर लगातार हिलाते हुए 10 से 12 मिनट या मिश्रण गाड़ा हो जाने तक उबालें और बाद में ठंडा होने दे।  

(3)  ठंडा होने के लिए रेफ्रिजरेटर में रख दे (डीप फ्रीज़र में न रखें ) और आपका बादाम पिस्ता फलूदा परोसने के लिए तैयार है।  

आपने मेरे इस आर्टिकल को पड़ा इसके लिए में आपका हार्दिक धन्यवाद करती हूँ। इसमें दिए गए व्यंजन की विधि को घर पर जरूर बना कर देखें और नीचे दिए गए कमेंट में सूचित करने की कृपा करें। 😊😊